ऐसे हुआ ‘ दिवाली खुशियों वाली ‘ अभियान का जन्म

label_importantअंतर्मुखी के दिल की बात

मेरा चातुर्मास उदयपुर में चल रहा है ।  प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यों में समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता लेकिन वो एक सितम्बर, 2019 की रात थी। बहुत देर से नींद नहीं आ रही थी। तभी मन में खयाल आया कि दिवाली नजदीक आ रही है। बीते कुछ वर्षों से हम दोहरी दिवाली अभियान चलाते रहे हैं, जिसमें गरीबों को मिठाई और कपड़े वितरित करने का कार्य होता था लेकिन यह बात मुझे हमेशा बेचैन करती थी कि केवल त्योहार पर कुछ चीजें देने मात्र से ही तो उनकी समस्या का स्थाई हल नहीं निकल सकता। मैं सोच रहा था कि उनकी गरीबी और परेशानी हमेशा के लिए दूर करने के लिए क्या हल निकाला जाए। यही सोचते-सोचते लिखना शुरू किया तो दिवाली खुशियों वाली अभियान का जन्म विचारों में हुआ, उसी रात दो बजे तक इस अभियान को मूर्त रूप देने का प्रयास करता रहा और सारी योजना बना डाली। मुझे लगा कि योजनाबद्ध तरीके से यह अभियान शुरू किया जाए तो इससे न केवल कुम्हार, बेरोजगार को काम मिलेगा बल्कि लोगों को प्राचीन संस्कृति की झलक भी दिखाई देगी। घर-घर हमारे अपनों के बने दीपक जलेंगे। बस सुबह उठते ही मैंने 2 सितम्बर को अपने परिचितों को अभियान का प्रारूप भेजा, सभी को बहुत सुंदर लगा। फिर इस अभियान को व्यवस्थित करने के लिए कुछ सुझाव भी सामने आए। उसके बाद इस अभियान का लोगो बनवाने, प्रचार-प्रसार की सामग्री पर सोचने का सिलसिला शुरू हुआ। मेरे सहयोगियों ने भी उत्साह और तत्परता से इस काम को पूरा किया और इस तरह से 8 सितम्बर तक ही अभियान का पूर्ण जन्म हो गया। सरकार, समाचार पत्रों से सहयोग के बाबत कुछ पत्र भी लिखे लेकिन वहां से कोई भी जवाब नहीं आया लेकिन मुझे तो यह अभियान शुरू करना ही था तो मैंने इस अभियान को अपने ही स्तर पर शुरू करने का मानस बनाया। हालांकि मैं एक दिगंबर संत हूं और सब कुछ त्याग चुका हूं लेकिन परहित का भाव मन में कुछ इस तरह था कि इस अभियान को मैंने खुद अपने ही हाथों में रखने का मन बनाया। इसके बाद 14 सितम्बर से धीरे-धीरे परिचितों को सोशल मीडिया के जरिए अभियान की जानकारी भेजना शुरू किया। मुझे सफलता तो मिली ही, लोगों का सहयोग भी मिलने लगा। इस अभियान को शुरू करने में सबसे बड़ी मुश्किल यही आई कि दीपक कहां से बनवाए जाएं। तीन-चार जगह दीपक बनवाने लिए संपर्क किया लेकिन वहां से संतोषप्रद जवाब नहीं आया लेकिन कहते हैं न कि जहां चाह, वहां राह। मुझे किशनगढ़ से जवाब सकारात्मक मिल गया और वहीं पर पहले एक लाख दीपक बनाने का ऑर्डर दे दिया। इसके बाद एक लाख दीपक बनाने का ऑर्डर और दिया। नतीजा यह है कि अब तक एक लाख दस हजार बनकर दीपक बनकर मेरे पास आ गए हैं। अभियान को उदयपुर, जयपुर, अजमेर,जोधपुर संभाग में चलाने का मानस बनाया है। सोशल मीडिया पर भी इस अभियान को सफलता मिलने लग गई है। धीरे-धीरे कई व्यक्तियों, संस्थानों और संगठनों ने इस अभियान से जुड़ना प्रारम्भ कर दिया है। कुछ लोग आगे बढ़कर सहयोग कर रहे हैं। अब मुझे विश्वास होने लगा है कि यह अभियान सफल अवश्य होगा।

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