ऐसे हुई अहिंसा युद्ध की स्थापना- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर

folder_openआलेख

 

भरत(bharat) चक्रवर्ती जब अपनी छह खण्ड की दिग्विजय कर अयोध्या लौटे तो चक्ररत्न अयोध्या के प्रवेश द्वार के अन्दर प्रवेश नहीं कर रहा था। तक राज्य ऋषियों ने भरत को कहा कि इस संसार में अब भी एक राजा ऐसा है, जिसने आपकी अधीनस्था स्वीकार नहीं की है। भरत ने कहा, वह कौन है? राजगुरु  ने कहा, राजकुमार बाहुबली(bahubali)। तो क्या मुझे अपने भाई से युद्ध करना होगा? मुझे नहीं चाहिए ऐसा चक्रवर्ती पद, जो एक भाई से युद्ध करवाए। राजगुरु ने कहा, यह तुम्हारे अकेले का निर्णय नहीं हो सकता। यह राज-काज का काम है। एक राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य के विस्तार और राज्य की भलाई के लिए परिवार का मोह त्यागे। बाहुबली के पास सन्देश गया तो बाहुबली ने कहा कि एक बड़े भाई के नाते हजारों बार प्रणाम है, हर आज्ञा का पालन होगा पर अभी यह सन्देश एक चक्रवर्ती ने भेजा है तो मैं अपने राज धर्म से बंधा हूं। एक राजा के नाते नमस्कार नहीं कर कर सकता हूं। मैं अपने पिता के दिए राज्य को नहीं दे सकता, अपने स्वाभिमान को नहीं छोड़ सकता हूं। तब निर्णय हुआ कि दोनों तद भव मोक्षगार्मी है। एक, कुछ होगा नहीं, दूसरा, प्रजा का नुकसान होगा।

तब निर्णय किया गया कि अहिंसा(ahinsa) युद्ध(yuddha) किया जाएगा, जिसमें दोनों भाई अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे और जो पराजित होगा, वही उसे अधीनस्थ रहेगा। तब प्रजा को एक शिक्षा भी मिली कि बिना हथियार भी युद्ध किया जा सकता है। दोनों भाइयों के बीच जल, मल और दृष्टि युद्ध हुआ। इन तीनों युद्धों में बाहुबली ने भरत को पराजित कर दिया। यह युद्ध कोई धन, जमीन या स्त्री के लिए नहीं था। भरत के लिए यह युद्ध चक्ररत्न को आयोध्या में प्रवेश करवाने के लिए या कहें, एक नियोग को पूरा करने के लिए था, जो उसके पुण्य का था। बाहुबली के लिए यह युद्ध अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए था। अंतरग में दोनों ही अपने आप से ग्लानि कर रहे थे। अपने किए कर्मों पर विचार कर रहे थे। दोनों ही क्षयिक सम्यदृष्टि थे, तद्भव मोक्षगामी थे। तो कैसे वह अन्याय की बात कर सकते, कैसे वे युद्ध कर सकते थे। हम तो यह कह सकते हैं, जिस प्रकार अदिनाथ का आहर पर इसलिए उठे कि जिससे आने वाले मुनियों को यह पता चल जाएगी दीक्षा के बाद आहर पर उतरा जा सकता है और इस प्रकार से उतरा जा सकता है। बस भरत और बाहुबली के बीच युद्ध ही यही सिखाने के लिए हुआ कि बिना हथियार उठाए युद्ध किया जा सकता है। तीनों युद्ध में बाहुबली विजय हुए और भरत को पराजित होना पड़ा। बाहुबली को इस घटना से वैराग्य हुआ, उसी समय युद्ध के मैदान से सब कुछ छोड़ वह वैराग्य के मार्ग की ओर बढ़ते हुए मुनि बन कर तपस्या करने लग गए। आत्म साधना करते वे मोक्ष को प्राप्त हो गए, आज हम उसी की आराधना करते हैं। श्रवणबेलगोला में हर बाहर वर्ष में उसका महामस्तकाभिषेक कर जैन समाज एकजुट होकर जैन कुंभ को मनाती है। पुराणिक कथा के अनुसार मंत्रियों और माता ने यह अहिंसा युद्ध का रास्ता निकाल कर भरत और बाहुबली के सामने रखा और दोनों ने सहजता से इसे स्वीकार कर लिया।

हम यह नहीं कह सकते कि बाहुबली ने भरत को हरा दिया, बल्कि सत्य तो यह है कि भौतिक शक्तियों को आध्यात्मिक शक्ति ने पराजित कर दिया। भरत छह खण्ड का राज्य प्राप्त करने के उद्देश्य के लिए युद्ध कर रहे थे तो बाहुबली अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए युद्ध लड़ रहे थे। इसलिए भौतिक शक्तियों पर आध्यात्मिक शक्ति की विजय हुई। बाहुबली एक वर्ष तक ध्यानस्थ खड़े रहे। उनके शरीर को सांप, वामी बेलों ने अपना घर बना लिया पर वह अपने ध्यान से नहीं हटे और दीक्षा के बाद एक ही स्थान पर खड़े रहे। वहीं से केलवज्ञान और मोक्ष हुआ। दीक्षा के बाद न ही आहर पर उतरे, न ही उपदेश दिया, बस अपने आप को जानने और पहचानने में अपने आप को लगा दिया।

Related Posts

Menu