चौथा दिन : अपने दोषों को स्वीकार करना ही सबसे बड़ा आत्मधर्म – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज भीलूड़ा में चातुर्मास रत हैं। मौन साधना की इस साधना में प्रातः 4 बजे समाज के अनेक लोग आते हैं और मंत्रों का जाप आदि करते हैं। मुनि का चिंतन आप सब पाठकों के लिए-

आज मौन के चौथे दिन, मैंने यह महसूस किया- जो बहुत पहले कर लेना चाहिए था, वह आज कर रहा हूं। बस, इसी बात का दु:ख है कि यह स्वीकार करने में इतना समय क्यों लग गया। दोषों को स्वीकार करना ही सबसे बड़ा आत्मधर्म है और आत्मचिंतन भी। मैंने जब दोषों को स्वीकार करना शुरू किया तो मन के एक कोने में फिर एक बात आई, जब दूसरों को यह बात पता चलेगी कि मैंने दोष किए हैं तो लोग यह जानकर क्या कहेंगे। कुछ देर बाद मेरी स्मृति में भगवान महावीर के जीवन की एक प्राचीन कहानी याद आ गई। मुझे इस कहानी से हौसला मिला कि दोषों को स्वीकार करना कोई गुनाह नहीं।

मैंने भी अपनी मौन साधना में अपने दोषों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। लोगों के डर से दोषों को स्वीकार नहीं करूंगा तो अपनी आत्मा को पवित्र कैसे बनाऊंगा। दोषों को स्वीकार करते-करते मन भटक भी जाता है, फिर बचपन की वह याद आती है, जब मैंने साइकिल चलाना सीखा। उस वक्त पहले साइकिल लड़खड़ाई और फिर स्थिरता आई। बस मन को भी इसी प्रकार समझा लेता हूं। संन्यास जीवन में दोष भी क्या, जब समझना चाहा तो एक ही बात आई- चिंतन में कि दूसरों की सुनों, पर स्वीकार मत करो। स्वीकार वही बात करो जो तुम्हारी अपनी सोच हो या फिर तुम्हारी गलती को उजागर करने वाली बात हो। जितने साधनों का उपयोग करोगे, उतना ही दोषों की ओर बढ़ते जाओगे। भले ही आधुनिक साधन खराब नहीं है, लेकिन संयम जीवन के लिए शोभनीय भी नहीं है। दूसरों को देखों, पर दया के भाव से, कब इसका कल्याण होगा। दूसरों से बोलो- पर अपने लिए नहीं, उनके स्वयं के लिए कि कहीं मेरे निमित्त ही इसका कल्याण हो जाए। यह अपने आपको समझ ले, जान ले और अपने आपको स्वीकार कर ले। जब आत्मचिंतन चल रहा है तो मुझे अपने ही दोष दिखाई देंगे। कौन क्या समझे, उससे मुझे क्या लेना-देना। मेरा तो प्रायश्चित हो रहा है और मेरी आत्मा निर्मल हो रही है।
यही सोच रहा था अपने दोषों को कहां से स्वीकार करूं, लेकिन पता ही नहीं चला। इतने में आंखें कब नम हो गईं और मैं ध्यान-चिंतन से बाहर आ गया।

(रविवार, 8 अगस्त 2021, भीलूड़ा)

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