भक्तामर स्तोत्र काव्य – 38

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 38

हाथी वशीकरण

श्च्योतन्-मदाविल-विलोल-कपोलमूल-
मत्त-भ्रमद-भ्रमर-नाद विवृद्ध-कोपम् ।
ऐरावताभ-मिभ-मुद्धत-मापतन्तम्,
दृष्टवा भयं भवति नो भवदा-श्रितानाम् ॥38॥

अन्वयार्थ : श्च्योतन् – झरते हुए । मदाबिल – मद से मलिन । विलोल – गीले । कपोलमूल – कपोल मूल (गण्डस्थल पर) । मत्त – उन्मत्त । भ्रमद् – परिभ्रमण करते हुए । भ्रमर–नाद – भोंरों के शब्द से । विवृद्धकोपम् – जिसका कोष बढ़ रहा है, ऐसे । ऐरावताभम् – ऐरावत गज के समान विशाल । आपतन्तम् – सामने आते हुए । उद्धतम् – उद्धत । इमम् – हाथी को । दृष्ट्वा – देखकर भी । भवदाश्रितानाम् – आपके आश्रित जनों को । भयम् – भय । नो – नहीं । भवति – होता है ।

अर्थ- आपके आश्रित मनुष्यों को झरते हुए मद जल से जिसके गण्डस्थल मलीन ,कलुषित तथा चंचल हो रहें हैं और उन पर उन्मत्त होकर मंडरतए हुए काले रंग के भौर अपने गुंजन से जिसका क्रोध बढा रहे हों ऎसे ऎरावत की तरह उद्दण्ड ,सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता ।

जाप – ऊँ नमो भगवते (अष्ट) महा-नाग-कुलोच्चाटिनी काल(कालद्र) –द्रंष्ट्र (द्रष्ट)मृतकोत्थापिनी पर मंत्र प्रणशिनी देवि शासन देवते ह्रीं नमो नम: स्वाहा ।

ऊँ ह्रीं शत्रु विजय रण रणाग्रे ग्राँ ग्रीं ग्रूं ग्र: नमो नम: ।

ऋद्धि – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो मण – बलीणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य –ऊँ ह्रीं हस्त्यादिगर्व दुर्द्धरभय निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं हस्त्यादिगर्व दुर्द्धरभय निवारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – पीले कपडॆ ,पीली माला,पीला आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

वश में हुआ हाथी

एक बार एक नगर में एक राजा राज्य करता था। उसका नाम सोमदत्त था। उसके पास बड़ी सी हाथी शाला भी थी, जिसमें अनेक हाथी थे। सोमदत्त का एक पुत्र था लेकिन वह बहुत ही बिगड़ा हुआ था। धीरे-धीरे उसने राज्य के सारे खजाने को खाली कर दिया और राजा को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया। एक दिन सोमदत्त के पुत्र ने हाथी शाला के एक हाथी को बहुत सारी मदिरा पिला दी। हाथी नशे में पूरे नगर में उत्पात मचाने लगा। तभी पास से जा रहे सोमदत्त की नजर हाथी पर पड़ी। उन्होंने उसके सामनेे भक्तामर स्तोत्र के 38वें श्लोक का पाठ करना शुरू कर दिया। दरअसल दुर्दिन में राजा जंगल में चला गया था, जहां से उसे वीतरागी मुनि श्री मिले। मुनि श्री ने उन्हें भक्तामर कंठस्थ करा दिया था और राजा भी पूरी श्रद्धा और भक्ति से भक्तामर का पाठ करता था। तो भक्तामर के कारण हाथी अचानक शांत हो गया। सारा नगर राजा की जय-जयकार करने लगा। राजा के चमत्कार की कीर्ति चारों ओर फैल गई तो पड़ोसी राजा ने अपनी सुंदर कन्या से राजा सोमदत्त का विवाह कर दिया। राजा ने फिर सेना एकत्रित की और अपना राज्य भी प्राप्त कर लिया। राजा ने अपने पुत्र को मुनि श्री के पास शिक्षा ग्रहण करने भेज दिया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 38वें श्लोक का पाठ करने से पागल हाथी को भी वश में किया जा सकता है।

चित्र विवरण- उद्धत मदोन्मत्त हाथी ,जिसके गण्डस्थल पर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं,से भी प्रभुक्त भयभीत नहीं है । अत: हाथी स्वयं उसके निकट आकर शांत हो गया है ।

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