भक्तामर स्तोत्र काव्य – 44

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 44

भयानक-जल-विपत्ति नाशक

अम्भो-निधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्रम्-
पाठीन -पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ ।
रंगत् तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥44॥

अन्वयार्थ: क्षुभित – क्षोभ युक्त होने से । भीषण – भयंकर । नक्र-चक्र – मगर समूह और । पाठीनपीठ – मच्छों (मगर) की पीठ की टक्कर से । भयदोलवण – भयोत्पादक एवं भयानक । वाडवाग्नौ – वडवानल से युक्त । अम्भोनिधौ – समुद्र में । रङ्गतरङ्ग – उत्ताल तरंगों के । शिखरस्थित – शिखर पर डगमगाते हुए । यानपात्रा:-जहाज । भवतः – आपके । स्मरणात् – स्मरण से । त्रासं – भय को ।विहाय – छोड़ कर । व्रजन्ति – आगे चले जाते हैं ।

अर्थ – क्षोभ को प्राप्त भयंकर मगर मच्छों के समूह और मछलियों के द्वरा भयभीत करने वाले दावानल से युक्त समुद्र में विकाराल लहरों के शिखर पर स्थित है जहाज जिनका,ऎसे मनुष्य आपके स्मरण मात्र से भय छोडकर पार हो जाते हैं ।

जाप – ॐ नमो रावणाय विभीषणाय कुम्भकर्णाय लंकाधिपतये महाबल पराक्रमाय मनश्चिंतितं कुरु कुरु स्वाहा।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो अमिय सवीणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं संसाराब्धि तारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं संसाराब्धि तारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – सफेद कपडॆ ,सफेद माला,सफेद आसन पर बैठकर उत्तर दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

अहिंसा ही अपिरहार्य

एक बार की बात है, एक नगर में ताम्रलिप्त एक सेठ हुआ करते थे। वह जैन धर्म के अनन्य पालनकर्ता थे और हमेशा जिन धर्म की प्रभावना में लीन रहते थे। वह सेठ हमेशा समुद्र के रास्ते ही व्यापार करते थे। समुद्र के रास्ते व्यापार को जाने वाले उनके अन्य साथी समुद्री तूफानों और जीवों से बचने के लिए पशु बलि दिया करते थे। उनका कहना था कि ऐसा करने से जल की देवी शांत रहती हैं लेकिन सेठ अहिंसा के पुजारी थे और उनकी बातों को टाल दिया करते थे। एक बार सेठ व्यापार करने निकले। आधे रास्ते पहुंचे तो उनका जहाज समुद्र की एक कुदेवी में रास्ते में रोक लिया। जहाज न तो आगे बढ़ रहा था और न ही पीछे जा रहा था। जहाज में सवार सभी लोग डर के मारे कांपने लगे। तभी वह कुदेवी प्रकट हुईं और बोली कि पशु बलि चढ़ाओ, तभी मैं जहाज को आगे जाने दूंगी लेकिन सेठ ने कहा कि मैं केवल अहिंसा धर्म का पालन करता हूं। पशु बलि कभी नहीं दूंगा और वह भक्तामर के 44वें श्लोक का पाठ करने लगे। कुछ देर बाद जहाज के हिलने-डुलने की आवाज आई और सबने देखा कि जहाज शांति से आगे बढ़ रहा है। सभी जोर से बोले, अहिंसा परमो धर्मः।

शिक्षा- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्तामर स्तोत्र के 44वें श्लोक का पाठ श्रद्धापूर्वक करने से बड़े से बड़ा तूफान भी टल जाता है और जीवन निर्बाध गति से आगे बढ़ने लगता है।

चित्र विवरण- तूफानी समुद्र में नौका ड्गमगा रही है । मगरमच्छ आदि जंतु नौका को उलटने के प्रयास में हैं । ऎसी विषम परिस्थिथि में भी भक्त के द्वारा भगवान का स्मरण किये जाते ही नाव सुरक्षित तट पर आ गई ।

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