भक्तामर स्तोत्र काव्य – 46

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 46

कारागार आदि बन्धन विनाशक

आपाद-कण्ठ-मुरु शृंखल-वेष्टि ताङ्गा,
गाढं बृहन् निगड -कोटि-निघृष्ट -जङ्घाः ।
त्वन् नाम –मन्त्र -मनिशं मनुजाः स्मरंतः
सद्यः स्वयं विगत -बन्ध-भया भवन्ति ॥46॥

अन्वयार्थ: आपाद कण्ठं – पैरों से लेकर कण्ठ तक | उरुश्रृङ्खल – बड़ी-बड़ी साँकलों से
| वेष्टिताङ्गाः – वेष्टित शरीर वाले | गाढम् – अत्यन्त कस कर बाँधी गई | बृहत्रिगड कोटि – बड़ी-बड़ी बेड़ियों के किनारों से | निघृष्टजङ् घाः – जिनकी जंघाएं घिस गई हैं | मनुजा:-ऐसे भी मनुष्य | त्वन्नाम मन्त्रम् – आपके नामरूपी मन्त्र को | अनिशं – निरन्तर | स्मरन्त:-स्मरण करते हुए | सद्य:- शीघ्र ही | स्वयं – स्वयं (अपने आप)|विगतबन्धभया – बन्धन-भय से रहित | भवन्ति – हो जाते हैं |

अर्थ- जिनका शरीर पैर से लेकर पर्यंत बडॆए-बडी साँकलों से जकडा हुआ है । और विकट सघन बेडियों से जिनका जंघायें अत्यंत छिल गई हैं ऎसे मनुष्य निरंतर आपके नाम मंत्र को स्मरण करते हुए शीघ्र ही बन्धन मुक्त हो जाते है ।

जाप – ॐ नमो ह्राँ ह्रीं श्रीं ह्रूँ ह्रौं ह्रः ठः ठः जः जः क्षाँ क्षीं क्षूँ क्षः क्षय: स्वाहा।

ॐ नमो ह्राँ ह्रीं श्रीं ह्रूँ ह्रौं ह्रः ठः ठः ठः जः जः ज: क्षाँ क्षीं क्षूँ क्षौं क्षः स्वाहा।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं णमो वड्ढमाणणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं नानाविध कठिन बन्धन दूरकरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं नानाविध कठिन बन्धन दूरकरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – पीले कपडॆ ,पीली माला,पीला आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

पुरुषार्थ का संदेश

बंग देश के सम्राट थे। उनके एक पुत्र था। उस पर जैन धर्म का बड़ा प्रभाव था। एक दिगंबर मुनि ने उसे जीने के तौर-तरीके सिखाए थे। बंग देश के पड़ोसी देश का सम्राट बंग देश को हमेशा परेशान किया करता था। परेशान होकर बंग देश के राजा ने अपने पुत्र को पड़ोसी देश के सम्राट से लड़ने भेजा लेकिन पड़ोसी देश के राजा ने उसे बंदी बना लिया और उसे कारागृह में डाल दिया। लेकिन राजा का पुत्र भी बहुत स्वाभिमानी था। उसने शत्रु देश के राजा से कोई क्षमा याचना नहीं की और भक्तामर के 46वें काव्य के पाठ में डूब गया। सात दिन तक वह विधि पूर्वक पाठ करता रहा और उसने देखा कि उसके बंधन अपने आप खुल गए हैं। जेल में पलंग बिछ गया है। देवियां उसके सामने स्वादिष्ट भोजन लेकर खड़ी हैं। पहरेदार तुरंत इस बात की सूचना देने राजा के पास गए। राजा वहां दौड़ा-दौड़ा आया और उसने देखा कि जेल के दरवाजे खुले हुए हैं और बंदी राजकुमार की सेवा में देवियां खड़ी हैं। राजा ने फिर से ताले लगवा दिए लेकिन अगले ही क्षण ताले फिर खुल गए। राजा नतमस्तक हो गया और ससम्मान राजकुमार को विदा किया। राजा ने भी जैन धर्म को स्वीकार कर लिया।

शिक्षा – इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 46वें काव्य का पाठ श्रद्धापूर्वक करने से भक्ति के माध्यम से सारे द्वार खुल जाते हैं। अज्ञान का कारागृह टूट जाता है और कर्मों की निर्जरा होती है।

चित्र विवरण- कारागार में कठोर बन्धन में पडा भक्त,प्रभु का नाम स्मरण करते ही गतबन्धन हो गया है । उसकी समस्त श्रृंखलाये टूट गयी हैं ।

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