भक्तामर स्तोत्र काव्य – 6

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 6

विद्या प्रदायक

अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान् माम् ।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र-चारु-(तच्चारु–चाम्र ) कलिका-निकरैक-हेतु ॥6॥

अन्वयार्थ – अल्पश्रुतं- अल्प शस्त्रों का ज्ञाता पुरुष । श्रुतवतां – बहु शास्त्रों के ज्ञाता पुरुषों की । परिहास घाम- हंसी का पात्र होता है । त्वद्-भक्ति: – आपकी भक्ति । एव –ही । माम्- मुझे । बलात्-बलपूर्वक । मुखरी कुरुते- वाचाल कर रही है । कोकिल: – कोयल । किल- निश्चय से । मधौ- बसंत ऋतु में । यत् – जो । मधुर- मधुर । विरौति – शब्द बोलती है । तत् च – उसमें । आम्र- आमकी । चारु कलिका – सुन्दर मंजरी का । निकरैकहेतु: – समुदाय ही एक मात्र कारण है ।

मंत्र जाप – ऊँ ह्रीं श्रां श्रीं श्रूं श्र: हं सं थ: थ: थ: ठ: ठ: सरस्वती भगवती विद्याप्रसादं कुरु कुरु स्वाहा ।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ – बुद्धीणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं याचितार्थ प्रतिपादनशक्ति सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं याचितार्थ प्रतिपादनशक्ति सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय

जाप विधि : लाल कपडे ,लाल माला , लाल आसन पर बैठक कर यंत्र स्थापित करें यंत्र पूजा करें । पूर्व दिक्षा कि और मुहकर जाप करें । 21 दिन तक प्रतिदिन ऋद्धि तथा मंत्र का 1000 बार जाप करें । हर बार कुन्दरु की धूप क्षेपण करें । दिन में एक बार भोजन और रात में पृथ्वी पर शयन करें ।

कहानी –

कुशाग्रमति

भक्तामर के प्रभाव से हमारी बुद्धि का विकास होता है। इसलिए इसे बुद्धिदायक माना जाता है। राजा हेमवाहन के दो पुत्र थे। बड़े का नाम भूपाल और छोटे का नाम भुजपाल था। भूपाल मंदबुद्धि और भुजपाल कुशाग्र था। दोनों भाइयों को अध्ययन के लिए पंडित श्रुतधर के आश्रम भेजा गया। गुरु ने दोनों को 12 वर्ष तक समस्त विधाओं की शिक्षा दी। भुजपाल इस अवधि में सभी चीजों में पारंगत हो गया लेकिन भूपाल को कुछ समझ न आया। श्रुतधर ने भूपाल को ज्ञान देने का अथक प्रयास किया लेकिन कुछ न हो सका। आखिर छोटे भाई से बड़े भाई का दुख न देखा गया और उसने उसे भक्तामर ोत की आराधना करने को कहा। भूपाल ने छठे श्लोक का बड़ा भक्तिपूर्वक अनुष्ठाकन किया। 21 दिन के अनुष्ठान के बाद भूपाल को जिन अधिष्ठात्री देवी ब्राह्मी के दर्शन हुए और उन्होंने भूपाल को कुशाग्रमति बनने का आशीर्वाद दिया। इस तरह से भक्तामर के छठे श्लोक के अनुष्ठान से जड़मति भूपाल भी बुद्धिमान बन गया और कई पुराणों की रचना कर डाली।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि जो भी भक्तामर के छठे श्लोक का पाठ पूरी भक्ति से करता है, वह कुशाग्रमति और बुद्धिमान बन जाता है।

चित्र विवरण- आम्रमंजरी को देखकर कोयल मधुर स्वर में गान कर रही है । आचार्य मानतुंग एवं भक्तगण भगवद भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति करने का प्रयास कर रहे हैं ।

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