भट्टारक परम्परा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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इतिहास गवाह है कि समय के साथ श्रद्धा,ज्ञान और आचार में शिथिलता आती जा रही है साथ ही हिंसा,झूठ,चोरी, का आतंक भी बढ रहा है । ऎसी परिस्तिथि में भी हमारी संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन का काम हमारे पूर्व आचार्य,मुनि द्वरा किया गया । आचार्य समंतभ्रद और अंकलकदेव का जीवन तथा निकलंक का बलिदान का इतिहास हमारे सामने है । एक क्षण पहले जो घटना घटती वही अगले क्षण इतिहास के पन्नों में जुड जाती है । जैसे जैसे समय निकल रहा धर्म में राजनिती का प्रवेश होते जा रहा है ,इसी कारण धर्म राज्य आश्रित होते जा रहा है । धर्म को समझने ,जाने के आधार मन्दिर,शास्त्र गुरु पर राजा अपना शासन करने की भावना से उन्हे अपनी आज्ञा मे रहने को मजबुर करने लगा ऎसी स्थिति में नंग आवस्था में सताधारीयों अपने संस्कृति को बजाना मुश्किल हो गया उसी समय मुनि और श्रावक के बीज की कडी जो बने वह भट्टारक कहलाने लगे । 12 वीं सदी के पहले नंग भट्टारक हुआ करते थे ,उसके बाद वस्त्र के साथ भट्टारक होने लगे क्यो कि मन्दिर की सम्पति और उस्की व्यवस्था नंग रहकर करना नामुकिन हो गया था । उस समय जो मुनि हुआ करते थे जिसने मन मे संस्कृति के संरक्षण राग था उन्हों वस्त्र पहन कर भट्टारक का स्वरुप धारण कर लिया ।

प्राचीन समय में मुनियों ने वस्त्र पहनकर भट्टारक संस्थान को जन्म इसलिए दिया था की उस समय हमारे धार्मिक मन्दिरों को ध्वंस करने लगे,साधुओं की तपस्या में बाधाअ डालने लगे यहाँ तक की हमारे संस्कृति को संजोए हुए ताड पत्र और शास्त्रों के भण्डार्य को जलाने लगे यह तक कि हम आपने अपने आप को जैन नही कह सकते तो तो कैसे श्रावक पनी सस्कृति का संस्रक्षण कर सकता था । प्राचिन इतिहास के पन्नो की और नजर डाले तो हमे पढने को मिलेगा की जैन साधुओ को घानी मे पेरने या गर्म तेल की कडाही मे डाला जाने लगा इस प्रकार की घटना हजारो साल तक चलती रही । इसे समय श्रावक अपनी सम्पति और अपने परिवार को बचाने मे लगा हुआ था । एसे समय मै भट्टारको ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समज कोसंगटःइत करने के साथ हाम्री संस्कृति संरक्षण करने जो योग्दान दिया है उसको हम भुला नही सकते । उस समय देश के कही जगह भट्टारक पीठ की स्थपान हूए जिससे जो हमारे हमारी संस्कृति को देखने का सौभग्य मिल रहा है । वर्तमान मे दक्षिण के अलावा भट्टारक पीठ पर भट्टारक विराजमान नही पर पीठ है । वर्तमान में 15 भट्टारक पीठ कर्नाटक में जिसमे भट्टारक स्वामी विराजमान । आज भी वह धर्म के संरक्षण का कार्य अपना कर्तव्य समझ कर कर रहे ।

इतिहास गवाह है कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं तो परम्पराएं,इतिहास, संस्कृति और संस्कार बदल ही जाते हैं। एक क्षण पहले जो घटित होता है, वही अगर क्षण इतिहास बन जाता है । बदलता नहीं है तो धर्म रुपी रथ के दो पहिए कहे जाने वाले संत और श्रावक का स्वरूप । स्वरूप का पालन करने वाले बदलते हैं। वे अपनी शक्ति के अनुसार उनका पालन भी करते हैं। भट्टारक परम्परा का भी इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। जब धर्म में राजनीति प्रवेश करने लगी तो धर्म की संस्कृति, इतिहास और उसकी धरोहर को क्षति पहुंचाने लगी । संत अपनी नंगन चर्या को पालन नहीं कर रहे थे। श्रावक अपने परिवार को बनाने में लगे हुए थे। कोई संत, मंदिर-मूर्ति के स्वरूप को संरक्षित करने को तैयार नहीं हो रहा था। उस समय नग्न मुनियों में धर्म के प्रतीक स्वरूप मंदिर, शास्त्र और मूर्ति के संरक्षण के लिए कपड़े पहने और मुनि और श्रावक के बीच की कड़ी के रूप में भट्टारकों की परम्परा का जन्म हुआ। मुनि अगर कपड़े पहन ले तो मुनिचर्या का पालन और संस्कृति का संरक्षण एक साथ नहीं हो सकता था। धर्म की पहचान को जीवित रखने के लिए भट्टारकों ने तंत्र, मंत्र और यंत्र साधना कर शास्त्र, मूर्ति और धर्म का संरक्षण करना प्रारम्भ किया और साथ ही अपनी साधना भी करते रहे।

सामाजिक और आत्मसाधना

भट्टारक मात्र सामाजिक कार्य के लिए नहीं, बल्कि अपनी आत्मसाधना के लिए भी कार्यरत थे। और आज भी कर रहे है । धर्म परिवर्तन का काल भी आया, जब भट्टारकों ने श्रावकों का मार्गदर्शन किया और धर्म के इतिहास को सुरक्षित रखा। यहां तक मुनि-श्रावकों को तेल में डाला गया, घानी मे पेरा गया और हमारी धरोहर को राजाओं ने अपने खजाने में डालना प्रारम्भ कर दिया। आज जो हमारे कुछ क्षेत्र और शास्त्र, मूर्ति हैं, जिनसे हम अपना जैन इतिहास जान पा रहे हैं, वह सब भट्टारकों की देने हैं। उनका जैन धर्म पर बहुत ही बड़ा उपकार रहा है। उपकारों का सम्मान करना हमारी परम्परा रही है। पंच परमेष्ठी में सिद्ध परमेष्ठी बड़े हैं पर आज भी हम पहले अरिहंत परमेष्ठी को नमस्कार करते हैं क्योंकि उन्होंने उपदेश देकर हमें धर्म का स्वरूप बताया। तो क्यों न हमारा हमें धर्म और प्राचीन इतिहास को देखने का लाभ देने वालों का हम वंदन करें।

भट्टारक शब्द का अर्थ

भट्टारक शब्द के अनेक अर्थ हैं। यहां तक कि तीर्थंकर के लिए भी भट्टारक शब्द का उपयोग किया गया है। भट्टारक परम्परा का उदय इतिहास को सुरक्षित रखने लिए हुआ था और वर्तमान में भट्टारक वही कर रहे हैं। भट्टारक परम्परा मोक्ष मार्ग का साधन है, मोक्ष मार्ग नहीं। जैन धर्म का अस्तित्व बचाने के लिए उसके इतिहास और उसकी कला को बचाना अधिक आवश्यक है। वह कार्य भट्टारकों ने ईमानदारी से किया है, हम उनकी इस परम्परा को नमस्कार करते हैं। वर्तमान में आप स्वयं दक्षिण भारत जाकर देखें कि किस तरह से भट्टारक अपने इतिहास की सुरक्षा कर रहे हैं। तो हमें अपने आप प्राचीन इतिहास की याद आ जाएगी। वर्तमान में15 भट्टारक हैं।

वर्तमान में भट्टारक पीठ कहां पर है।

श्रवणबेलगोला, कोल्हापुर, हुम्चा, नान्दनी, मूड़बद्री, कारकल, स्वादी, सौन्दा,नरसिंहराजपुरा, जिनकांची (तमिलनाडु), अरिहंतगिरि, कनकगिरि,कम्बदहल्ली, वरुर,अरतिपुर ।

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