स्वाध्याय – 12 : चार अनुयोग

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प्रथमानुयोग : पुण्य रूप अर्थ का व्याख्यान करने वाला चरित्र को, पुराण को, बोधि- समाधि के निधान भूत कथा वर्णन को जानता है उसे सम्यग्ज्ञान प्रथमानुयोग कहते हैं।
करणानुयोग : जो लोक और अलोक के विभाग को, काल परिवर्तन को और चारों गतियों के वर्णन को दर्पण के समान जानता है उसे सम्यग्ज्ञान करणानुयोग कहते हैं ।
चरणानुयोग : गृहस्थ और मुनियों के चारित्र की उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षा के कारण भूत शास्त्र को जानने वाले को सम्यग्ज्ञान चरणानुयोग कहते हैं ।
द्रव्यानुयोग : जीव-अजीव तत्त्व को, पुण्य-पाप को और बन्ध -मोक्ष को प्रकाशित करने वाला दीपक द्रव्यानुयोग है, जो श्रुतज्ञान के प्रकाश को विस्तृत करता है ।
(रत्नकरण्ड श्रावकाचार)

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