चौथे कुशील पाप में प्रसिद्ध यमदण्ड कोतवाल की कहानी

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आहीर देश के नासिक्य नगर में राजा कनकरथ रहते थे उनकी रानी का नाम कनकमाला था। उनका एक यमदण्ड नाम का कोतवाल था। उसकी माता अत्यन्त सुन्दरी थी। वह यौवन अवस्था में विधवा हो गई थी तथा व्यभिचारिणी बन गई थी। एक दिन उसकी पुत्रवधू ने रखने के लिये आभूषण दिया। उस आभूषण को पहनकर वह रात्रि में अपने पहले से संकेतिक जार के पास जा रही थी। यमदण्ड ने उसे देखा और एकान्त में उसका सेवन किया। यमदण्ड ने उसका आभूषण लाकर अपनी स्त्री को दिया। स्त्री ने देखकर कहा कि यह आभूषण तो मेरा है, मैंने रखने के लिए सास के हाथ में दिया था। स्त्री के वचन सुनकर यमदण्ड कोतवाल ने विचार किया कि मैंने जिसके साथ उपभोग किया है वह मेरी माता होगी। तदनन्तर यमदण्ड, माता के जार के संकेतगृह (मिलने के स्थान) पर जाकर उसका पुनः सेवन किया और उसमें आसक्त होकर गूदरीति से उसके साथ कुकर्म करने लगा।

एक दिन उसकी स्त्री को जब यह सहन नहीं हुआ तब उसने अत्यन्त कुपित होकर धोबिन से कहा कि हमारा पति अपनी माता के साथ रमता है। धोबिन ने मालिन से कहा और मालिन कनकमाला रानी की अत्यन्त विश्वासपात्र थी, वह उसके निमित्त फूल लेकर गई। रानी ने कौतूहल वश उससे पूछा कि कोई अपूर्व बात जानती हो? मालिन कोतवाल से द्वेष रखती थी, अतः उसने रानी से कह दिया कि देवि! यमदण्ड कोतवाल अपनी माता के साथ रमण करता है। कनकमाला ने यह समाचार राजा से कहा और राजा ने गुप्तचर के द्वारा उसके कुकर्म का निश्चय कर कोतवाल को पकड़वाया। दण्डित होने पर वह दुर्गति को प्राप्त हुआ।

अनंत सागर
श्रावकाचार ( 77वां दिन)
शुक्रवार , 18 मार्च 2022, घाटोल

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