छहढाला दूसरी ढाल छंद 5

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छहढाला

दूसरी ढाल

अजीव एवं आस्रव तत्त्व का विपरीत श्रद्धान

तन उपजत अपनी उपज जान, तन नसत आपको नाश मान।
रागादि प्रगट ये दु:ख देन, तिनही को सेवत गिनत चैन।।5।।

अर्थ – मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के प्रभाव से जीव के शरीर की उत्पत्ति को ही अपनी अर्थात आत्मा की उत्पत्ति मानता है और शरीर के नाश को आत्मा का नाश मानता है । राग-द्वेष आदि जो स्पष्ट रूप से आत्मा को दुख देने वाले है उन्हीं को सेवन करता हुआ यह जीव उनको सुख देने वाला मानता है।

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