छहढाला पांचवी ढाल छंद-4

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छहढाला

पांचवी ढाल

अशरण भावना

सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दलेतें ।
मणि मंत्र तंत्र बहु होई, मरते न बचावै कोई ॥4॥

अर्थ- जैसे-हिरण को सिंह नष्ट कर देता है वैसे ही इन्द्र नागेन्द्र एवं विद्याधर आदि को मृत्यु नष्ट कर देती है। मणि, मन्त्र, तन्त्रादि कितने ही उपाय क्यों न किये जाँय, मरने से कोई नहीं बचा सकता।

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