प्रेरणा -‘किसी भी काम का उद्देश्य होना जरूरी है’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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हम कोई भी काम करें, उसके पीछे एक उद्देश्य होना जरूरी है और साथ ही यह भावना भी जरूरी है कि जो काम मैं करूंगा वह समाज और देश के लिए किसी ना किसी तरह से उपयोगी साबित होगा।
इस बात को समझने के लिए यह कथा पढ़िए- भारत में प्राचाीन काल में एक बहुत बड़े रसायनशास्त्री थे, जिनका नाम था नागार्जुन। एक बार उन्हें अपनी सहायता के लिए एक सहायक की जरूरत महसूस हुई। उनकी जरूरत के बारे में जानकार रसायनशास्त्र में रूचि रखने वाले दो युवक उनके पास पहुंचे। उन्होंने दोनों युवकों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक खास रसायन बना कर लाने को कहा। दोनों युवक चले गए। दो दिन बाद पहला युवक आया और अपना बनाया रसायन नागार्जुन को दिया। नागार्जुन ने पूछा कि कोई कष्ट तो नहीं हुआ। युवक ने कहा कि कष्ट तो कई आए। पिता ज्वर में थे। माता को भी शारीरिक व्याधि थी, लेकिन मैंने कहीं ध्यान नहीं दिया और सिर्फ रसायन बनाने में लगा रहा। नागार्जुन ने उसकी बात सुन कर कुछ कहा नहीं और रसायन लेकर रख लिया। कुछ देर बाद दूसरा युवक आया। नागार्जुन ने उससे पूछा तो युवक ने कहा कि उसे दो दिन का समय और चाहिए। नागार्जुन ने पूछा क्यों…. तो युवक ने कहा कि मैं जब यहां से जा रहा था तो रास्ते में एक बीमार वृद्ध मिला। उसकी पीड़ा मुझसे देखी नहीं गई। मैं उसे अपने घर ले आया। यहां उसकी सेवा की और इस दौरान मुझे रसायन बनाने का ध्यान ही नहीं रहा। अब आप दो दिन का समय मुझे दे दीजिए।
पहले युवक ने सोचा ऐसी स्थिति में उसका चयन तो पक्का है…लेकिन नागार्जुन ने मुस्कुराते हुए दूसरे युवक से कहा तुम्हें और समय देने की जरूरत नहीं है। तुम आज से ही मेरे साथ काम कर सकते हो। इस पहले युवक ने हैरान होते हुए नागार्जन के निर्णय का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि रसायन हम औषधी के लिए बनाते है और यदि रसायन बनाने वाले के मन में किसी की पीड़ा के प्रति करूणा का भाव नहीं है तो उस रसायन को बनाने का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। तुमने सिर्फ काम किया, उसके उद्देश्य को भूल गए। दूसरे युवक ने काम भले ही नहीं किया, लेकिन उसके मन में उद्देश्य अच्छा था। ऐसे मंे यह आगे काम करेगा तो अच्छे उद्देश्य के लिए ही करेगा, इसीलिए इसका चयन किया गया है।
अर्थात…सिर्फ काम करना महत्वपूर्ण नहीं है। काम का उद्देश्य होना और मन के भाव पवित्र होना भी जरूरी है।

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