किसी भी रूप में आ सकते हैं प्रभु – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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अशुभ कर्मों को काटने और शुभ कर्म करने के लिए मात्र एक मंदिर ही एकमात्र स्थान है। मंदिर ही एक ऐसा स्थान है, जहां प्राणी निर्भीक रहता है। चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो, देव हो या तिर्यंच… सब अपने दिल की बात मंदिर में प्रभु की आराधना करते-करते कह देते है। जीवन की अच्छी घटना हो या बुरी प्राणी मात्र सब बातें प्रभु से कर सकता है। अपने पापों को स्वीकार करते-करते उसकी आंखें भी मंदिर हो जाती हैं। वह मन ही मन पश्चाताप करता है। प्रभु के समक्ष पाप कर्म से दूर रहने, नकारात्म सोच बदलने का संकल्प भी कर लेता है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि सभी को प्रभु पर विश्वास है। सब जानते हैं कि यहां कुछ भी गलत नहीं होगा। जो होगा अच्छा ही होगा। यह बात अलग है कि मंदिर से बाहर आने के बाद अहंकार, क्रोध, ईष्र्या, राग-द्वेष आदि कषायों में फंस कर वह यह भूल जाता है कि उसने मंदिर में क्या संकल्प किया था। मंदिर के बाहर भी संकल्प याद रहें इसीलिए तो शास्त्रों में मंदिर के अंदर पूजन, पाठ, भक्ति और अभिषेक आदि करने का और मंदिर के बाहर प्राणी मात्र से वात्सल्य, दूसरे की अच्छाई देखना, सहयोग करना, पेड़-पौधांै का संरक्षण करना, दुःखी प्राणियों की ओर दया-करुणा का भाव रखना, शत्रु के प्रति भी अच्छा व्यवहार और सोच रखाना आदि शुभ कर्म करने का उपदेश दिया है। यह शुभ कर्म करने से पुण्य का संचय होता है। उसी पुण्य के प्रभाव से हमारे संकल्प हमें याद दिलाने के लिए प्रभु किसी भी रूप में हमारे पास आ सकते हैं। प्रभु किस रूप में आकर हमें समाझाने की कोशिश करेंगे यह प्रभु ही जानते हैं। जब प्रभु किसी भी रूप में हमारे पास आ सकते हैं तो हमें हर प्राणी के प्रति प्रेम, दया, करुणा, वात्सल्य और मदद का भाव रखना और हर प्राणी की बात को सुनने समझने की इच्छा रखनी चाहिए। हमारे संपर्क में जो भी मन से, वचन से और काया से आता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा हो, संत हो यह गृहस्थ, साहूकार हो या चोर सबके प्रति आदर, सम्मान रखना चाहिए। यह जरूरी नही की प्रभु तुम्हारी सहायता मनुष्य बन कर ही करें। वे पशु, पक्षी, पेड़, देव या किसी शुभ-अशुभ घटना के द्वारा भी हमारी सहायता के लिए आ सकते हैं। इसलिए जो भी घटना, निमित्ति हमारे साथ हो उन सब को अपने कर्म का फल मानकर प्रभु का संकेत समझते हुए मन में प्राणी मात्र के लिए एक समता भाव रखें। कहा जाता है कि कण-कण में हैं भगवान। इसका अर्थ ही यह है कि तुम प्रकृति की हर वस्तु से प्यार करो। फिर देखना तुम्हारा दिल ही मंदिर बन जाएगा और ऐसा हुआ तो वह दिन भी दूर नहीं जब पूरा देश ही तीर्थ बन जाएगा।
अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
(चौबीसवां भाग)
13 अक्टूबर, 2020, मंगलवार, लोहारिया
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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