भाग एक : गृहस्थ रहकर बने भी जो महान वीतरागी संत – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

• मुनि चर्या को पुनर्जीवित करने वाले संत शिरोमणी आचार्य शांति सागर जी महाराज
• निर्दोष चर्या को देख कर समाज ने नाम के आगे लगाया चारित्र चक्रवर्ती
• 20 वीं सदी के पहले आचार्य होने के कारण बने प्रथमाचार्य

हम आपको 20 वीं सदी के एक ऐसे महान संत से परिचित कराने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने समूचे जीवन को बचपन से ही संयम, संस्कार, दया, करुणा और त्याग जैसी अनमोल भावनाओं से सिंचित किया। एक ऐसे संत, जिन्होंने 20वीं सदी में मुनि चर्या का निर्दोष पालन किया और मुनि चर्या को पुनः जीवंत किया। उस मुनि की महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने ही दीक्षा गुरु को दीक्षा दी। जिनका जीवन प्रकृति के अनुसार था और कभी विकृति को प्राप्त नहीं हुआ। उन्होंने शास्त्रों की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें ताड़ पत्र पर खुदवाया। बाल विवाह, विधवा विवाह जैसे विषयों पर समाज का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने समाज की अनेक कुप्रथाओं और कुपरंपराओं को बंद करवाया। इतना सब करने के बावजूद गृहस्थ और संत जीवन में कभी अपनी चर्या में दोष नहीं लगने दिया। खास बात यह भी थी कि वह गृहस्थ रहकर कर भी संत जैसे रहे। खेती करते हुए भी कभी तिर्यंच प्राणियों को कष्ट नहीं दिया। जिनकी मुनि दीक्षा के 100 वर्ष पूर्ण हो गए । ऐसे महान वीतरागी, पथ प्रदर्शक संत का नाम है आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज। अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज आपको अपनी डायरी के माध्यम से सहज और सरल भाषा में आचार्य श्री की चर्या, ज्ञान और निस्पहृता से अवगत करवाएंगे। आचार्य श्री निर्दोष चर्या को देख कर समाज, शिष्यों ने उनके नाम के आगे चारित्र चक्रवर्ती लगाया। वहीं वह 20 वीं सदी के पहले आचार्य बने तो उनके नाम के आगे प्रथमाचार्य जैसे शब्दों के उपयोग भी होने लगा।

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