रावण… लेकिन मेरा पछतावा मेरी अच्छाई का प्रमाण! – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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मैनें सीता का हरण तो किया पर उसका भोग नहीं किया, क्योंकि वह मुझे नहीं चाहती थी। वह मेरे अपने महल में थी तो भी मैनें जबरन उस पर अधिकार नहीं जमाया। मेरी पत्नी पटरानी मंदोदरी ने भी सीता को समझाया था कि तुम रावण को स्वीकार कर लो पर सीता के मना करने पर कभी मैंने बल प्रयोग नहीं किया। सीता का हरण किया यह मेरा अपराध था, मेरी बुराई थी पर सीता को स्पर्श तक नहीं करना मेरी अच्छाई थी, मेरी नेकी थी। एक बात बताऊँ, जब मैं सीता का हरण कर उसे विमान से लंका ले जा रहा था तब सीता राम वियोग में आर्तनाद करते हुए विलाप कर रही थी। मैं उसके आंसूओं को देख विरक्त हो गया। मैनें उसे अपने से दूर बैठा दिया। मैं सीता से नजर भी नहीं मिला पा रहा था। मैं उसे वहीं छोड़ना चाहता था, पर विधि का विधान था और मेरे मन का विचार कि इसे धन, वैभव, शक्ति, धार्मिक क्रिया, खाने-पीने के व्यंजन और अन्य प्रभावों से परिचित करवाकर इसका मन परिवर्तित करूँगा और अपना बना लूंगा। यह केवल मेरा विचार था। मैं एक पतिव्रता स्त्री की भावनाओं को समझ नहीं पाया कि सीता जैसी नारी इन तुच्छ वस्तुओं के छलावे में नहीं आती। पर मैनें अपना संयम नहीं खोया। बताओ आज के जमाने में कोई है जो सारे साधन और शक्ति होने के बाद स्त्री के मोह में संयम रखे। अरे! आज तो लोग अपने रूतबे और धन का इस्तेमाल स्त्री की मर्यादा को तार-तार करने में करते हैं और उसे रावण वृत्ति कहते हैं? नहीं, मैं रावण संयमी था ये मेरी वृत्ति नहीं।
मैं सीता के लिए व्याकुल हुआ, यह मेरे पाप कर्म का उदय था क्योंकि इसके बाद मेरा सबकुछ चला गया। परस्त्री की भावना मात्र ने मुझसे शक्ति, धन, ज्ञान, विनय और अपने भाई, बेटा, पिता, मंत्री, पत्नी, बहन, मित्र को दूर कर दिया। सीता का हरण करने के बाद ही मैं अहंकारी हुआ और गुरु का अविनय करने लगा। मेरे भाई विभीषण ने मेरा त्याग कर दिया। मैं युद्ध में मारा गया। कोई कहता है राम ने मारा, कोई कहता है लक्ष्मण ने। राम तो दयालु थे, वो शत्रु से प्रेम करते थे, और फिर जिनका भाई लक्ष्मण हो उसे युद्ध की क्या आवश्यकता। लक्ष्मण नारायण थे और मैं प्रतिनारायण हमारे बीच युद्ध होना ही था, और मेरा अंत भी निश्चित था। मेरा संहार तो मेरे कर्मों की गति का परिणाम था।
मैं यहाँ आपके समक्ष वह कह रहा हूँ जो मेरे मन की पीड़ा है, ज्ञानी के अज्ञानमयी अंधकार में खोने की वजह है। पर अपनी कमजोरी और पापकर्म का बोध कर आत्मग्लानि के साथ प्रायश्चित करना आसान नहीं, यह तो कोई पुण्यशाली जीव ही कर सकता है और मैं हूँ पुण्यशाली क्योंकि मैं जीवन-मरण से मुक्त हो मनुष्य से तीर्थंकर होने का अधिकारी बन चुका हूँ।
आप ही बताओ कि कीचड़ में यदि आपको हीरा नजर आए तो क्या करोगे। हीरे की संपूर्ण चमक को देखने के लिए उस पर से कीचड़ हटा दोगे और हीरे को ही सजाओगे ना। कीचड़ का रोना ही रोते रहोगे तो हीरे को पा सकोगे क्या? मेरे जीवन के गुणों की चमक ही आपका भला कर सकती है। मेरे जीवन के एक गलत कार्य के कीचड़ को हटाकर मेरे अनन्य सत् गुणों को देखोगे, समझोगे और सिर्फ उन्हे ही धारण करोगे, तो अवश्य ही आपके परिणाम शुद्ध होंगे। मेरे पुतले को जलाकर मुझे कोसने से यह परिणाम शुद्ध नहीं होंगे। आप अपने अंतर्भाव में सोचिए कि सही क्या है और गलत क्या है।

अनंत सागर
अंतर्भाव
(छब्बीसवां भाग)
23 अक्टूबर, 2020, शुक्रवार, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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