दीपों से जगमगाया शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर

मां पद्मवाती की मूर्ति का भव्य श्रंगार

 

भीलूड़ा। अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सान्निध्य में शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर नौ दिन तक जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और मां पद्मवाती की आराधना की गई। महोत्सव के अंतिम दिन बड़े ही उत्साह से मां पद्मावाती का स्वर्णआभूषण से भव्य श्रंगार किया जाता है। कर्नाटक में इस प्रकार का उत्सव मनाने की परम्परा रही है।प्रातःकाल भगवान पार्श्वनाथ का पंचामृत अभिषेक हितेश जैन,मीनेष जैन,प्रतिभा जैन ने किया। उसके बाद मां पद्मवाती का श्रृंगार किया गया। शाम 7 बजे पंडाल में मां पद्मवाती की मूर्ति को साड़ी, चूड़ी,फल,फूल और रोशनी से सजाया गया और 1008 दीपकों का स्वस्तिक बनाकर सहस्त्रनाम के मंत्र बोलते हुए दीप जलाए गए।
मां पद्मावती की आराधना के मुख्य यजमान प्रेरणा नरेंद्र शाह सागवाड़ा थे। इसकी साथ ही सुनीता कमलेश जैन परिवार ने भी प्रमुख यजमान बनकर आराधना की।  दीपिका जैन, सुलोचना जैन, मोनिका जैन, अंजली जैन, हिमानी जैन, संध्या जैन, प्रियंका जैन,संगीता जैन, प्रतिभा जैन, सुषमा जैन ने भी मां पद्मावाती की गोद भराई की और सभी आराधना करने वाले श्रावकों ने 1008 दीप जलाए। प्रत्येक परिवार ने मां पद्मावती को कुमकुम अर्चना,अर्घ्य,दीपक फल भी समर्पित किए। मुख्य कलश स्थान मोहित जैन व चार कलश की स्थापना का लाभ हितेश जैन, दीपक जैन,पंकज जैन,तृष्टि जैन को मिला। आरती चेतना जी और अष्ट द्रव्य समर्पण करने का लाभ धर्मेंद्र जैन को मिला।
नौदिवसीय आराधना क्षुल्लक अनुश्रवण और तृष्टि दीदी के मार्गदर्शन में एवं हितेश जैन मीनेष  जैन निदेशन में सम्पन्न हुए। संचालन धमेंद्र जैन ने किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से रमणलाल जैन, अरविंद जैन, ओमप्रकाश जैन,कांतिलाल जैन,जयंतीलाल जैन,कमलेश जैन,ललित जैन,अनोखी जैन,मोहित जैन,सुभाष जैन,चंद्रकांत शाह आदि उपस्थित थे।

इस मौके पर अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि तीर्थंकर के यक्ष – यक्षिणी ने धर्म प्रभावना का सहयोग किया है। उनके उपकार का स्मरण करते हुए सम्मान स्वरूप पूजन आराधना करना हम श्रावकों का कर्तव्य है। शास्त्रों में उल्लेख है कि चक्रवर्ती भरत ने 9 दिन तक देवी- देवताओं की आराधना की थी, तभी से यह परम्परा चली आ रही है। इनकी आराधना से हमारे धर्म प्रभावना में सहयोग मिलता है। देवी देवताओं की आराधना से सम्यक्त्व में मलिनता नहीं आती, बल्कि धर्म प्रभावना होता है।

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होम्बुज में हर्षोल्लास से मनाया जाता है नवरात्र पर्व : – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

धार्मिक संस्कृति से ओत-प्रोत भारत संसार का ऐसा देश है जहां सभी धर्मों के पर्व और त्यौंहार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सभी धर्मों के त्यौंहार और पर्व यहां बड़े उल्लास, उमंग और श्रद्धा से मनाए जाते हैं। नवरात्रि जैसा त्यौंहार तो सभी को आन्तरिक शक्ति से परिपूर्ण कर देता है। इस लेख में हम जानेंगे जैन धर्मावलम्बियों के प्रमुख तीर्थ होम्बुज देवी मंदिर के बारे में जानेंगे जहां नवरात्रि का पर्व बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है और यह प्रमाणित करता है कि जैन धर्म में नवरात्र कितना महत्वपूर्ण अनुष्ठान व पर्व है –

अतिशयकारी होम्बुज देवी

देश-विदेश से भक्तगण माता होम्बुज पद्मावती के दर्शनों के लिए आते हैं। होम्बुज पद्मावती कर्नाटक के मनोरम तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर चमत्कारी प्रभावों से आज भक्तों में बड़ा ही प्रसिद्ध हो गया है। सातवीं सदी में उत्तर मथुरा के उग्रवंशी जिनदत्त राय ने यहां अपने राज्य की स्थापना की थी। यह राजा जैन धर्मावलम्बियों की यक्षिणी पदमावती देवी के परम भक्त थे। यहां पर कुल दस मंदिर हैं, परन्तु मुख्य मंदिर अतिशयकारी पद्मावती जैन मंदिर है जो भगवान पार्शवनाथ मंदिर के साथ स्थित है।

मनोरथ होते हैं यहां पूर्ण

यहां बड़ी संख्या में भक्त आते हैं और देवी के वर प्रसाद से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। कहा जाता है कि यहां से आज तक कोई भक्त खाली हाथ नहीं गया और नवरात्रों में तो यहां देवी के दर्शनों के लिए भक्त उमड़ पड़ते हैं। माता की मू्र्ति जितनी मनोहारी है उतनी ही उनकी ख्याति है। यहां देवी पदमावती अपने चैतन्य और जीवन्त रूप में उपस्थित हैं।

राजवंश को मिली श्रेष्ठ महिला शासक

माता की भक्ति और शक्ति का ही प्रताप है कि इस राजवंश में श्रेष्ठ महिला शासकों चाकल देवी, कालल देवी और शासन देवी आदि जैसी कई शक्तिशाली महिला शासक मिली जिन्होंने शासन की बागडोर संभाली। होम्बुज की गुरुपरंपरा कुन्दकुन्दानवयांतर्गत नंदी संघ से सम्बन्धित है। इसके भट्टारक स्वामी देवेन्द्र कीर्ति के नाम से जाने जाते हैं जो समस्त क्षेत्र की व्यवस्था का प्रबन्धन करवाते हैं तथा साथ ही अनुष्ठान, धार्मिक कार्य और समारोह उन्हीं के सानिध्य में आयोजित होते हैं।

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शिष्य की साधना देख गुरु स्वयं माैजूद रहे आहार चर्या में, 54 दिन बाद मुनि ने किया आहार में अन्न का ग्रहण

भीलूड़ा/ डूंगरपुर । भीलूड़ा में चातुर्मासरत अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने 54 दिन बाद मंगलवार काे अन्न का आहार किया। इसी उपलक्ष्य में भीलूड़ा में साधना महाेत्सव मनाया गया। आचार्य अनुभव सागर महाराज के प्रथम शिष्य मुनि पूज्य सागर महाराज की तरफ से 48 दिन की माैन साधना के साथ 24 दिन का उपवास व 24 दिन अन्न का त्याग रहा। 54 दिन बाद मंगलवार काे अन्न आहार करने से पहले पडगाहन हुआ। इस दाैरान इनके गुरु आचार्य अनुभव सागर महाराज स्वयं आहार चर्या के दाैरान माैजूद रहे। वहीं स्वयंभू सागर महाराज भी माैजूद रहे। इस दाैरान सागवाड़ा से प्रेरणा शाह, उषा जैन, तुष्टि दीदी, आदिश खाेडनिया आदि माैजूद रहे। आचार्य ने अनुभव सागर महाराज ने कहा कि विश्वास और आचरण प्रकाश और ऊष्मा की तरह होता है। जहां प्रकाश है वहां ऊष्मा अवश्य होती है। उसी तरह जिसके हृदय में विश्वास होगा तो वह विश्वास उसके आचरण में भी अवश्य दिखाई देगा। श्रद्धाहीन को भगवान भी धातु और पत्थर के दिखाई देते हैं जबकि श्रद्धावान को पत्थर में भी भगवान दिखते हैं। श्रद्धा ही तो है जो हमे अदृश्य अमूर्त आत्म तत्व की और बढ़ने और इस कठिन मार्ग पर चलने का साहस देती है। आचार्य ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी धर्म के वास्तविक रूप को नई समझ कर उससे दूर हो रही है क्योंकि जब वह धर्मात्मा के व्यवहार में परिवर्तन नहीं देखते तो उन्हें व्यक्ति से नहीं धर्म से अलगाव हो जाता है। मंदिर से निकलने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है क्योंकि मन्दिर से निकलकर उसका व्यवहार बहुतायत व्यक्तियों की धर्म के प्रति आस्था को बढ़ा भी सकता हैं और घटा भी सकता है।

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54 दिन बाद 28 सितंबर काे आहार में करेंगे अन्न ग्रहण, मनाया जाएगा साधना महाेत्सव

भीलूड़ा/ डूंगरपुर। भीलूड़ा में चातुर्मासरत मुनि पूज्य सागर महाराज 54 दिन बाद 28 सितंबर काे आहार में अन्न ग्रहण करेंगे। इसी उपलक्ष्य में 28 सितंबर काे भीलूड़ा में साधना महाेत्सव मनाया जाएगा। जाे 25 नवंबर तक चलेगा। इस अवधि में पुस्तक प्रकाशन व पाैधराेपण व धार्मिक कार्यक्रम हाेंगे। जानकारी के अनुसार आचार्य अनुभव सागर महाराज के प्रथम शिष्य मुनि पूज्य सागर महाराज की तरफ से 48 दिन की माैन साधना के साथ अब 24 दिन का उपवास व 24 दिन अन्न का त्याग रहा। अब 54 दिन बाद 28 सितंबर काे अन्न ग्रहण हाेगा। 28 सितंबर काे सुबह 4 बजे पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा के बाद आहार हाेगा। महाराज का पाद प्रक्षालन हाेगा। दसलक्षण पर्यूषण पर्व में उपवास करने वाले 12 जनाें का सम्मान किया जाएगा। इसके बाद शाम काे भजन संध्या का कार्यक्रम हाेगा। इसकी तैयारियां चल रही है। यह पूरा कार्यक्रम आचार्य सुंदरसागर महाराज के अशीर्वाद व सागवाड़ा में चातुर्मासरत आचार्य अनुभव सागर महाराज के सानिध्य में हाेगा। आचार्य सुंदर सागर एवं आचार्य सुनील सागर महाराज के संघ में शामिल दीदी की गाेद भराई का कार्यक्रम हाेगा।

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साक्षात्कार : मौन साधना से मन के रुग्ण विचार होते हैं दूर, सच्चा राजनीतिक नेता वही, जो मौन पूर्वक कार्य करता हो, आज नेता मौन नहीं है, इसलिए विवाद हो रहे है : मुनि श्री

अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज 48 दिन की मौन साधना सम्पन्न, दैनिक भास्कर से सांझा किए अपने अनुभव

12 साल का संकल्प पूर्ण हुआ है, अगले साल भी होगी मौन साधना, लेकिन क्या होगा प्रारुप, यह तय नहीं है

डूंगरपुर। भीलूड़ा में चातुर्मास आचार्य अनुभव सागर महाराज के प्रथम शिष्य अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज 48 दिन की मौन साधना के साथ जाप-अनुष्ठान में लगे रहे। मुनिश्री का मौन धारण 5 अगस्त से शुरू होकर 21 सितम्बर तक चला। उनका कहना है कि आज मैं जिस मुकाम पर हूं, उसका पहला श्रेय माता- पिता और दूसरा श्रेय गुरुजनों को है। आचार्य वर्धमान सागर, आचार्य अभिनंदन सागर, आचार्य अनुभव सागर और जीवन में धर्म का बीजारोपण करने वाली मां आर्यिका वर्धित माता जी के वात्सल्य गुणों के कारण मैं धर्म के मार्ग पर हूं। मौन साधन में 2 लाख जाप और 50 से अधिक बार हवन में आहुति दी गई। उन्होंने यह भी कहा कि मौन साधना आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज और आचार्य अनुभव सागर महाराज के आशीर्वाद से सम्पन्न हो सकी। अन्तर्मुखी मुनि के दैनिक भास्कर संवाददाता सिद्धार्थ शाह से बातचीत के प्रमुख अंश।
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सवाल -डेढ़ माह से ज्यादा अर्थात 48 दिन की मौन साधना का विचार कैसे मन में आया?
जवाब- मौन साधना का विचार श्रवणबेलगोला के कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी को देखकर मिली। उन्हें देखकर आनन्द की जो अनुभति हुई, वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते। मौन का क्रम 2008 में शुरू किया। उस समय मैं मुनि नहीं, क्षुल्लक अवस्था में था। उस समय नाम अतुल्य सागर था। मुझे यह समझ में तो आ गया कि जैसी संगति करेंगे, वैसे ही बन जाएंगे।

सवाल- वह कौन सी वजह थी जिससे आपने मौन साधना का व्रत लिया। अब तक कुल कितने दिन की मौन साधना कर चुके हैं?
जवाब- प्रेरणा तो स्वामी जी से मिली। पर एक बार 2007 में किसी से धर्म चर्चा को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय बाद मैं मौन हो गया और किसी बात का जवाब नहीं दिया तो मामला शांत हो गया। उस दिन मुझे लगा कि विवादों से दूर रहना हो तो मौन कर लेना। मैंने मौन रखा तो समझ में आया कि मौन से धर्म को सही तरीके से समझा जा सकता है। मौन साधन करते 12 वर्ष हो गए हैं। इनमें समय की अवधि और साधना करने के तरीके में अंतर जरूर रहा है।
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सवाल – क्या आप यह मानते हैं कि मौन साधना से मन के रुग्ण विचार दूर होकर ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं?
जवाब- हां, इसमे कोईं संदेह होना भी नहीं चाहिए। मौन से मन की ही नहीं, बल्कि वचन, काय से सम्बंधित अशुभ क्रिया भी कम हो जाती है और रुग्ण विचार भी दूर होते हैं। हम जितना मौन की साधना में आगे बढ़ते हैं, उतना हम निविकल्प होते जाते हैं। अशुभ कर्म से दूर होने के लिए मौन से अच्छा कोई साधना है ही नहीं। आत्मचिंतन का वास्तविक आनंद मौन में ही है।
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सवाल -चातुर्मास में मौन साधना का क्या उद्देश्य, जबकि यह समय प्रवचन आदि करने का होता है?
जवाब- वास्तव में चातुर्मास ही साधना का समय है। पहले मुनि तो चार चार महीने का उपवास लेकर मौन के साथ ध्यान पर बैठ जाते थे। शास्त्र के अनुसार चातुर्मास में इतने समय तक एक ही स्थान पर रहते हैं। आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने साधु का स्वरूप बताते हुए कहा है कि जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ -परिग्रह से रहित और ज्ञान, ध्यान और तप में लीन रहना साधु की चर्या है। इसमें प्रवचन तो कहीं आता ही नहीं है। पर धर्म प्रभावना के लिए यह सब जरूरी है। धर्म प्रभावना से पहले आत्म प्रभावना जरूरी है।

सवाल -मन में आने वाले विचारों पर रोक संभव नहीं, ऐसे में क्या राजनीतिक और सामाजिक विचार भी मन में अपना ताना-बाना फैलाते हैं?
जवाब- असंभव तो कुछ भी नहीं है। पर हां, इस काल मे विचारों पर रोक सम्भव नहीं है। यह सही है कि कई विचार आए, उसमें राजनीतिक और सामाजिक विचार भी थे। जब तक पूर्ण ध्यानावस्था में नहीं जाते हैं, तब तक संसार की हर बातों का ध्यान आएगा। उन्हीं बातों का ध्यान आएगा जिनसे हमारा संपर्क है। संसार के संपर्क से तोड़ने और आत्मा से संपर्क जोड़ने के लिए ही तो मौन के साथ ध्यान किया जाता है। संपूर्ण ध्यानावस्था बिना मुनि बने और उसमें भी जब मुनि आहार, विहार, निहार से रहित होकर बैठता है, 7-8 गुणस्थान में पहुंचता है तब वास्तविक ध्यान होता है। उसके पहले तो मात्र ध्यान का अभ्यास है। मौन से मन आदि की चंचलता दूर की जा सकती है।

सवाल -क्या अगले वर्ष भी चातुर्मास में ही मौन साधना करेंगे?
जवाब- 12 साल का संकल्प तो पूर्ण हुआ है। अगले साल मौन तो करेंगे, पर उसका प्रारूप क्या होगा, यह अभी नहीं कह सकते हैं। गुरुदेव से वार्ता कर इस पर विचार करेंगे कि और किस प्रकार मौन साधना को मजबूत कर सकते हैं।


सवाल -क्या मौन साधना से मनुष्य परमपद को प्राप्त कर सकता है जो मानव जीवन का अंतिम उत्कर्ष है?
जवाब – मौन से ही परमपद की प्राप्ति संभव है। मौन में व्यक्ति अधिक समय तक दूसरों के बारे में नहीं सोच सकता है। धीरे- धीरे वह अपने लिए सोचना शुरू कर देता है और मौन में रहने से हमें अपनी गलती का अनुभव भी जल्दी होता है। पर, मौन के साथ धार्मिक जानकारी और सकारात्मक सोच का होना आवश्यक है, तभी मौन साधना का वास्तविक आनंद आता है। जितने भी तीर्थंकर हुए हैं या अन्य जीव परमपद को प्राप्त किए हैं, वह सब मौन और ध्यान के माध्यम से किए हैं।

सवाल -क्या राजनीतिक नेताओं को मौन साधना के पथ पर अग्रसर होना चाहिए ताकि राजनीतिक कीचड़ की उछाल पर रोक लगे?
जवाब- सच्चा राजनीतिक नेता वही है जो मौन पूर्वक कार्य करता हो। आज नेता मौन नहीं हैं, इसलिए तो विवाद हो रहे हैं। नेता देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और पूरा देश उनके काम से प्रसन्न हो, यह संभव भी नहीं है। अगर वह मौन रहे तो काम होगा, विवाद नहीं। राजनीति में मौन इसलिए जरूरी है क्योंकि इनसे विकास के काम तो रुक जाते हैं और व्यक्तिगत एक दूसरे पर कीचड़ उछलते हैं जो राजनेताओं को और क्रोधी और एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। जब एक मां- बाप की संतान के एक जैसे विचार नहीं होते हैं तो सब के विचार एक कैसे हो सकते हैं? यही सोचकर मौन रहना चाहिए।

(जैसा मुनि श्री ने भास्कर रिपोर्टर सिद्धार्थ शाह को बताया )

साभार – दैनिक भास्कर डूंगरपुर में प्रकाशित

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अड़तालीसवां दिन : पुरानी और आने वाली बातों में न उलझें – अंतर्मुखी पूज्य सागर जी महाराज

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 48वां दिन। इंसान जब भविष्य की सोचता है, भूत का स्मरण करता है और वर्तमान के बारे में नहीं सोचता है तो उसका जीवन उलझ जाता है। विवादों की जड़ यही से फैलती है। पुरानी बातों, नई बातों में उलझे रहेंगे तो वर्तमान की परिस्थिति से कैसे लड़ पाएंगे? आज यही हो रहा है। व्यक्ति,परिवार,समाज सबके सब पुरानी और आने वाली बातों में उलझे हुए हैं, इसलिए वर्तमान की परिस्थिति से लड़ ही नहीं पाते हैं।

जब एक स्त्री की शादी होती है तो वह यही सोचने लगती है कि उसक अच्छा घर हो, वह मां बन पाए, बच्चा जब पढ़ता है तो वह यह सोचने लग जाती है कि उसे अच्छी नौकरी मिलेगी कि नहीं। व्यापारी यह सोचता है किस वस्तु का भाव बढ़ने वाला है, उसी को अधिक खरीद लूं। कोई यह सोचता है कि कहां मैंने यह माल खरीद लिया, यह खरीद लेता तो आज इतना कमा लेता। कहां मैंने यह पढ़ाई कर ली और कुछ करता तो कुछ तो काम मिल जाता। कहां मेरी शादी हो गई और कहीं करती तो कितने मजे से रहती।

यह सब कल्पनाएं हैं। ना जाने क्यों इंसान इन कल्पनाओं में पड़कर अपने वर्तमान के कीमती समय को बर्बाद कर रहा है। जो चला गया, वह आने वाला नहीं और जिसके बारे में सोच रहे हैं, वह मिलेगा या नहीं उसका पता नहीं है। और जो है उस पर ध्यान, समय ही नहीं दे रहे हैं। आज जो विवाद सुलझ नहीं रहे हैं, इसका कारण भी यही है कि वर्तमान में नई सोच के साथ काम शुरू करने के पहले ही यह बात होना शुरू हो जाती है कि उसने ऐसा कहा था-किया था। अब पता नहीं आगे क्या करेगा? इन सब बातों में ही हम वर्तमान का समय निकाल देते हैं और हमारे हाथ में कुछ नहीं आता। मात्र विवादों को जाल बनता जाता है और जीवन भर इन सबमें उलझे रहते है जिससे वर्तमान भी हाथ से निकल जाता है। समझदारी तो इसी में है कि वर्तमान में क्या परिस्थिति है? उसे कैसे सहजता से सुलझाया जा सकता है? उसी पर काम करना चाहिए। भविष्य और भूत की सोच में आज बेरोजगारी,तनाव, आत्महत्या जैसी परिस्थितियां बनती जाती हैं।

मंगलवार, 21 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज 48 दिन के बाद 22 सितम्बर को मौन खोलेंगे

भक्तामर विधान के माध्यम से भगवान आदिनाथ की अर्घ्य, दीपक,नैवैद्य से पूजन

भीलूड़ा। अन्तर्मुखी पूज्य सागर महाराज के 48 दिवसीय मौन साधना के अंतिम दिन सुबह चार बजे से भक्तामर विधान के अंतर्गत अर्घ्य, दीपक,नैवैद्य से भगावान आदिनाथ की पूजन किया गया। चौबीस तीर्थंकर का पूजन, तीर्थंकर के 1000 हजार नाम मन्त्रो की आहुति और अर्घ्य चढ़ाए गए, 56 पकवानों से भी आराधना की गई। उल्लेखनीय है कि अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज 5 अगस्त से 21 सितम्बर तक लगातार की मौन साधना कर रहे हैं। मुनि श्री के साथ इस आराधना में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज और समाज के अन्य लोग शामिल होते थे। इन 48 दिनों में मुनि श्री के द्वारा कई प्रकार के मंत्रों का जाप किया गया।

तुष्टि जैन ने बताया कि मुनि श्री 12 वर्षों से इस प्रकार की 48 दिन की साधना कर रहे हैं। मुनि श्री ने इस साधना का प्रारंभ श्रवणबेलगोला से किया था, तब वह क्षुल्लक अतुल्य सागर महाराज के नाम से जाने जाते थे। मुनि श्री को इस साधना की प्रेरणा श्रवणबेलगोला के भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी को देखकर मिली। वह भी मौन साधना करते थे। उनसे प्रेरित होकर मुनि श्री ने भी यह साधना प्रारम्भ कर दी। मुनि श्री मौन साधना के साथ एक उपवास और एक दिन अन्न के त्याग के साथ आहार ग्रहण करते थे। इन 48 दिनों में 24 उपवास और 24 दिन अन्न का त्याग रहा। आचार्य सुंदर सागर महाराज,आचार्य अनुभव सागर महाराज के आशीर्वाद से यह साधना मुनि श्री ने पूरी की है।

अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज प्रतिदिन मौन साधना में मुनि जाप, हवन,पाठ,भक्ति, लेखन से अपने भावों को निर्मल करते थे। दैनिक भास्कर, डूंगरपुर ने मुनि श्री के 48 दिन के चिंतन को प्रतिदिन प्रकाशित किया जो संग्रहणीय है। इसी क्रम में समाज के 48 परिवारों ने भी भक्तामर विधान कर 2,688 अर्घ्य भगवान आदिनाथ को समर्पण किए। मुनि श्री की मौन साधना आज पूर्ण हो जाएगी, पर अन्य साधना का क्रम जारी रहेगा। मुनि श्री की इस साधना में, समाज द्वारा 48 दिन की जो आराधना की जा रही है, वह भी 25 सितम्बर को पूर्ण होगी।

आने वाले दिनों भीलूड़ा जैन समाज द्वारा और गुरुभक्ति द्वारा मुनि श्री के मार्गदर्शन में इस साधना महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। महाराज जी उसी दिन अन्न ग्रहण करेंगे। मौन साधना का अनुभव मुनि श्री स्वयं अपनी कलम से आने वाले दिनों में बताएंगे।

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12 श्रावक – श्राविका ने एक साथ पहली बार किए 10 उपवास

 भीलूड़ा । @तृष्टि जैन । अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सान्निध्य और आशीर्वाद से स्थानीय दिगम्बर जैन समाज के 12 श्रावक- श्राविका ने एकसाथ पहली बार पर्युषण पर्व पर 10 उपवास की साधना की। सभी के उपवास का पालना सोमवार को दिगम्बर जैन मंदिर के प्रांगण में अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के  सान्निध्य और समाज को लोगों की उपस्थिति में कराया गया। सर्वप्रथम जिनेन्द्र का पंचामृत अभिषेक, पूजन किया गया, उसके बाद भक्तामर विधान हुआ। विधान के बाद सुबह 9:45 बजे मुनि के मार्गदर्शन में संघस्थ दीदी तृष्टि ने नारियल के जल से सभी तपस्वियों का पालना करवाया। साथ ही परिवार के सदस्यों, सकल जैन समाज भीलूड़ा के पंच महानुभावों और बाहर से आए मेहमानों का पालना करवाया।
इस अवसर पर समाज के सभी श्रावक- श्राविका के साथ बाहर से आए सभी मेहमान मौजूद रहे। मंगलवार को मुनिश्री पूज्य सागर महाराज ने सुबह 4 बजे केशलोचन भी किए।

अन्तर्मुखी का संदेश

10 उपवास आप सभी तपस्वियों के जीवन में संस्कारों का शंखनाद करेगा। उपवास की स्मृतियों में आप सभी को ऐसा एक नियम लेना चाहिए जिससे आप जिनेन्द्र देव, गुरु और शास्त्र से सदैव जुड़े रहें। दस उपवास जो आप सबके बने, वह सब आपके पुण्य का ही उदय था। बस इस पुण्य को बनाए रखें तभी इस उपवास की साधना का पूर्ण फल आप सबको मिलेगा।

इन्होंने किए उपवास

रचित पिता हितेश जैन, प्राची पति निशांत जैन, संध्या पति भावेश जैन, आस्था पिता भरत शाह, प्रेक्षा पिता कमलेश शाह, दिया पिता मुकेश शाह, दीपिका पति मोहित जैन,अक्षय पिता मनोज जैन,मोनिका पति कल्पेश जैन,कल्पेश पिता धनपाल शाह,हिमेश पिता कमलेश जैन, वर्षा पति विनोद जैन। इन 12 उपवास करने वालों में मोनिका- कल्पेश पति- पत्नी हैं। इन दोनों ने जोड़े के साथ उपवास किए हैं।

12 उपवास करने वालों के उद्गार :

धर्म का सही अर्थ जानने को मिला

घर पर सुना था कि मुनि पूज्य सागर महाराज एक भी उपवास नहीं कर सकते थे, पर चातुर्मास में मौन साधना के 24 उपवास और 24 दिन बिना अन्न के आहार ले रहे हैं तो मेरे मन में भी आया कि साधना से शक्ति आती है। मम्मी भी हमेशा कुछ ना कुछ व्रत करती रहती थीं, तो वह संस्कार का भी प्रभाव रहा। 10 दिन शांति से निकले। पहली बार उपवास किया तो शरीर की पीड़ा थी, पर मुनि श्री के आशीर्वाद से उसका एहसास नहीं हुआ। वास्तव में, धर्म का सही अर्थ जानने को मिला।

सागर महाराज के आशीर्वाद से ही पूरे हुए उपवास

मेरे उपवास तो मुनि पूज्य सागर महाराज के आशीर्वाद से ही पूरे हुए हैं। मुनि के सान्निध्य में सामायिक, प्रतिक्रमण रोज करते थी तो अच्छा लगा। इतने नजदीक से किसी साधु से बात करना मेरे जीवन का पहला मौका ही था। पहली बार उपवास किया तो उपवास के दौरान शरीर में पीड़ा हुई, पर अन्य तपस्वियों और मुनि श्री को देखकर अपनी पीड़ा भूल जाती थी। उपवास के समय इतना समझ पाई कि धर्म,गुरु,स्वाध्याय से कठिन से कठिन कार्य भी आसान हो जाता है।

गुरुदेव ने सबका ध्यान रखा

मुझे उपवास करने की हिम्मत नहीं थी। एक-दो उपवास करने के भाव थे, पर न जाने कहां से हिम्मत बढ़ती गई और उपवास हो गया। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैंने 10 उपवास कर लिया है। सच कहूं तो इन उपवास को पूरा करने में जो मुझे शक्ति मिली, वह अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज को देखकर मिली। उपवास के समय गुरुदेव ने सबका ध्यान रखा। किसे क्या तकलीफ है, वह पूछते थे और उसका उपाय बताते थे तो अच्छा लगा और हिम्मत हो गई कि गुरु और शांतिनाथ भगवान हैं सब अच्छा होगा। उपवास के समय यह जानने को मिला कि धर्म कथाओं से दुख को कम करने का सहारा मिलता है।

उपवास के समय मन की निर्मलता बढ़ी

दो-तीन बार 5 उपवास की, पर 10 नहीं हो पाए। इस बार मन दृढ़ता, परिवार का साथ और सबसे बड़ी बात मुनि पूज्य सागर महाराज का आशीर्वाद था। मुझे उन पर श्रद्धा थी कि उनके आशीर्वाद से उपवास पूरे हो जाएंगे। पहले कोरोना होने से डर था कि कुछ हो न जाए और मुनि श्री कहते थे कुछ नहीं होगा। मुनि श्री के कारण मेरी 10 उपवास की इच्छा पूरी हो गई।  10 दिन तक सामायिक, प्रतिक्रमण साधना में समय निकला। प्रतिदिन मुनि श्री का सम्बोधन मिलता था कि उपवास हो जाएंगे, अच्छे से हो जाएंगे। और वास्तव में उपवास हो भी गए। उपवास के समय में मन की निर्मलता बहुत हुई और विचारों में सकारात्मकता के विचार आए हैं।

धर्म ही इंसान का सहारा

पर्युषण पर्व के पहले दिन जब पहला उपवास किया तो उसी दिन से मुनि श्री कहते थे कि 10 उपवास करना है। हिम्मत आती गई और उपवास पूरे हो गए। मुनि के सान्निध्य में प्रतिदिन पूजन किया। मुनि श्री सभी उपवास का इतना ध्यान रखते थे कि किसने अभिषेक, पूजन किया, किसने नहीं। मुनि श्री का वात्सल्य देखकर भी हिम्मत हुई। घर में पति, सासू,भाभी जी का सम्बल भी बहुत रहा। इन सब के सहयोग और मुनि के आशीर्वाद से उपवास कर पाई। धर्म को समझती नहीं हूं, पर उपवास के समय में इतना जान पाई कि धर्म ही वास्तव में इंसान का सहारा है।

उपवास की पहली प्रेरणा घर से मिली

घर में धर्म का माहौल पहले से ही है। मम्मी- पापा उपवास, धार्मिक अनुष्ठान, जाप आदि करते रहते हैं। दादा और दादी पुजन,पाठ करते रहते हैं। पहली प्रेरणा तो घर से ही मिली और हम दोनों भाई बहन ने उपवास का मानस बनाया और उसके बाद मुनि पूज्य सागर महाराज से आशीर्वाद लिया। उनके सान्निध्य में 10 उपवास की साधना प्रारम्भ की तो मुनि श्री का वात्सल्य मिला जिससे उत्साह और दुगना हो गया और 10  उपवास का पता ही नहीं चला। शरीर को कष्ट तो हुआ पर मुनि श्री के कारण हिम्मत बढ़ जाती थी। उपवास से यही जान पाया कि हर कार्य से पहले देव,शास्त्र और गुरु का आशीर्वाद आवश्यक है।

विवाह के समय के एक वचन का पालन हुआ

मेरा सौभाग्य है कि मैंने और मेरी पत्नी मोनिका ने साथ में 10 उपवास किया है। यह विवाह के समय दिए एक वचन का पालन भी हुआ। पर्युषण का पहला दिन तो उपवास करना था। दूसरे दिन रविवार का एक समय खाना था तो दुकान पर दो बजे गई। पापा ने कहा अब क्या खाना, आज भी उपवास कर लो तो उस दिन भी उपवास हो गया। पत्नी की हिम्मत और अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के आशीर्वाद और सान्निध्य में हिम्मत बढ़ती गई। मुनि श्री के आशीर्वाद से और पिताजी के सहयोग से यह 10 उपवास की साधना आज पूर्ण हो गई। उपवास के समय नकारात्मक सोच आई, पर वह तत्काल सकारात्मक सोच में बदल गई। यही उपवास का फल है।

मुनि श्री के सान्निध्य से उपवास पूरा हुआ

जब मैंने पहला उपवास किया तबतक मेरे तीन उपवास तक के ही भाव थे, किन्तु जैसे- जैसे दिन आगे बढ़ते गए, भाव भी बढ़ता गया और आज 10 उपवास पूर्ण हो गए। भगवान शांतिनाथ की कृपा एवं अन्तर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज  का सान्निध्य था, तभी यह 10 उपवास निर्विघ्न सम्पन्न हुए। मुनि श्री का प्रतिदिन सामायिक में भी सान्निध्य मिला। पिछले 10 दिनों में मैंने यह अनुभव किया कि मेरे भावों में शुद्धि आई है। मुझे इन 10 दिनों में किसी भी विषय को लेकर नकारात्मक विचार नहीं आए हैं। इस तपस्या में श्रीजी की आराधना और महाराज जी का सान्निध्य पाकर मैं गद्गद हूं।

मन में भगवान को बैठा लो सफलता मिल जाती है

मैं दस उपवास कर लिए यह मेरे पुण्य का उदय ही था । घर में सासु मां हर समय व्रत करती है उन्हें देखकर ही मन बना की उपवास करना चाहिए । इस बार भीलूड़ा में चातुर्मास अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का हो रहा तो मुझे और सम्बल मिला । मुनि श्री के आशीर्वाद से यह 10 उपवास आसानी से हो गए । मुनि श्री में बहुत हिम्मत दी और उसी हिम्मत से पर्युषण पर्व के दस उपवास की साधन आज सम्पन हूं । 10 दिन के उपवास से यह समझ में आ गया कि जब भी साधना करना होतो जिनेन्द्र भगवान को मन में बैठकर संकल्प कर लो सब कुछ अच्छा होगा ।मैंने भी भगवान शांतिनाथ को दिल में बैठकर यह व्रत पूर्ण किया ।

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सैतालिसवां दिन : इंसान की पहचान उसकी इंसानियत – अंतर्मुखी पूज्य सागर जी महाराज

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 47वां दिन। विवाद में नहीं सुलह में, तर्क में नहीं जिज्ञासा में, बोलने में नहीं सुनने में, क्रोध में नहीं क्षमा में, तोड़ने में नहीं जोड़ने में खुशियां छुपी हुई हैं। ऐसा करने से खुशी मिलती भी है और दूसरे भी खुश होते हैं। फिर क्यों हम खुशी के लिए न जाने दुनिया में कहां- कहां नहीं भटक रहे हैं। हम दूसरों में खुशी ढूंढ रहे हैं लेकिन स्वयं के आचरण को बदलने से खुशियां अपने आप आ जाती हैं।

अपने आपको इतना सहज, सरल और आचरण को इतना निर्मल बना लें कि हर कोई हमसे बात करने में, हम तक पहुंचने में, अपनी बात कहने में किसी प्रकार डरे नहीं। साथ ही यह संकल्प भी कर ले कि मैं किसी से ऐसी बात, ऐसा मार्गदर्शन नही दूंगा जिससे उसका धर्म,संस्कार,संस्कृति, परिवार की परम्परा दूषित हो। साथ ही अपना आचरण भी ऐसा नहीं रखूंगा जिससे मेरा धर्म, संस्कार, संस्कृति, परिवार की परंपरा दूषित हो। बिना धर्म, संस्कार आदि के जीवन में खुशियां की कल्पना करना व्यर्थ है। इंसान की अपनी पहचान उसकी इंसानियत है और इंसानियत जिसके पास है, खुशियां उसके कदम चूमती है। जब खुशी का अनुभव नहीं हो तब यह समझना कि इंसानियत चली गई। उसी समय यह खोज करना शुरू कर देना कि मैंने अपनी इंसानियत कहां खोई है। जिस समय यह पता चल जाएगा, उसी समय खुशी लौट आएगी।

कभी आपने किसी पशु- पक्षी को इंसान के नाम से बुलाते देखा है क्या? पर इंसान को जानवरों के नाम से बुलाते तो देखा है। जैसे किसी इंसान को गधा, कुत्ता आदि कह देते हैं। वजह यह कि इंसान ने अपनी खुशियों को छोड़कर अपने आचरणों को जानवरों जैसा बना लिया है।

सोमवार, 20 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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मन की आवाज सुनें – मुनि पूज्य सागर महाराज

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 46वां दिन। कहना आसान है, पर करना मुश्किल। सुनना अच्छा है, पर अनसुना करना मुश्किल। देखना आसान है, अनदेखा करना मुश्किल और उपदेश देना आसान है, पर उसकी पालन करना मुश्किल है। इन्हीं के कारण व्यक्ति दोहरा जीवन जी रहा है। ऐसे व्यक्ति जिंदगीभर असमंजस में रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को खुद का ही पता नहीं होता है कि वह क्या कर रहा है। ऐसे व्यक्ति परिणाम के बारे में भी नहीं सोचते। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति कभी भी जीवन में सही निर्णय नहीं ले पाते हैं और कभी भी अपनी बात पर अडिग भी नहीं रह सकते हैं। वह समय-समय पर अपनी बात से पलट जाते हैं। दोहरा जीवन जीने वाला व्यक्ति सदैव जीवन के फैसले डर और स्वार्थ से लेता है। स्वार्थ और डर से लिए गए  फैसले समाज, परिवार और अपने आप में कभी भी न तो शांति ला सकते हैं और न ही समृद्धि को प्राप्त करा सकते हैं। खुद के मन की आवाज सुनने वाला व्यक्ति ही दोहरे जीवन से निकल सकता है। वह अपनी पहचान बनाता है और न्याय करने की क्षमता भी रखता है। खुद के भीतर की आवाज भेदभाव रहित और खुद के लक्ष्य को पूरा करने वाली होती है। सुनी- सुनाई बातों पर यकीन करने वाले व्यक्ति अपने लक्ष्य से भी भटक जाते हैं।

मन और मस्तिष्क कई प्रश्न स्वयं खड़े करता है और खुद ही एक-एक प्रश्न के अनेक उत्तर निकालता है। ऐसे व्यक्ति कभी भी अपनी सोच से नहीं, बल्कि दूसरों की सोच से काम करते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी भी न तो धार्मिक, न सामाजिक, न पारिवारिक, न राजनीति और न ही लौकिक कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। न ही वह समाज को कोई अपना मशिवरा दे सकते हैं। दूसरों के विचारों और रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति खुद के मन और मस्तिष्क को कचरा पात्र के समान बना लेता है। ऐसे व्यक्ति समाज और परिवार में सकारात्मक सोच भी पैदा नहीं कर सकते और न ही परिवार और समाज के विकास में भागीदार बन सकते हैं।

रविवार, 19 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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