नाम नहीं कर्म महान बनाते हैं – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

label_importantकर्म सिद्धांत

जैन सिद्धांत कहता है की व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती नाम में क्या रखा है। नाम बड़ा काम खोटा और नाम छोटा और लेकिन काम खरा हो सकता है। कर्म ही व्यक्ति के जीवन की घटनाओं को तय करता है। प्राणी अपने पूर्व भव के कर्मों के कारण से जन्म कहीं भी ले सकता है लेकिन वर्तमान में किए गए कर्म ही भविष्य तय करते हैं। महान वही हो सकता जो भूत और भविष्य की छोड अपने वर्तमान को संवारता है। एक भजन भी है -वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता है। इसका क्या मतलब है। वर्तमान में भगवान महावीर के आचरण की आवश्यकता है।
कर्मों के खेल समझने के लिए एक ही जीव के तीन प्रसंग बताता हूँ। जीव एक ही था पर पर्याय अलग अलग थी। जीव कौन था प्रसंग से समझ जाएंगे नही तो अंत मे पता चल जाएगा।
प्रथम प्रसंग : भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत के पुत्र मरीचि ने अपने दादा आदिनाथ के साथ दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली पर कर्मो के उदय से वह दीक्षा छोड़ अन्य वेश धारण कर 363 हिंसा आदि को पोषण करने वाले मिथ्या मत को चलाने लगे। इसके फल से तिर्यंच, नरक आदि गतियों में भ्रमण किया।
दूसरा प्रसंग : एक आदिवासी था जिसका नाम पुरुरवा भील था और उसकी पत्नी का नाम कालिका था। वह दोनो जंगल में शिकार कर रहे थे। पुरुरवा भील ने दूर से देखा कि कोई हिरण खड़ा है। भील ने शिकार करने के लिए तीर कमान निकाला और निशाना साधने लगा तभी पत्नी कालिका ने रोका और कहा नहीं नही यह हिरण नही है यह वन देवता (दिगम्बर मुनि) हैं। दोनों पास में गए तो मुनिराज श्री सागरसेन अपनी साधना कर रहे थे। भील दंपत्ति ने नमस्कार किया। धर्मभाव से मुनिराज ने उपदेश दिया। उपदेश के प्रभाव से पुरुरवा भील ने मद्य, मांस और मधु का त्याग किया। इस त्याग के प्रभाव से मरकर स्वर्ग में सौधर्म देव हुए।
तीसरा प्रसंग : सिंह हिरण का शिकार कर खा रहा था। यह दृश्य चारणऋद्धिधारी मुनि अजितजय और अमितगुण ने देखा। धर्मभाव से उन दोनों के मन मे शेर को उपदेश देने का विचार आया और उन दोनो ने शेर को धर्म-अधर्म,अहिंसा-हिंसा का उपदेश दिया। उपदेश के प्रभाव से शेर को जातिस्मरण हो गया। आंखों से अश्रु गिरने लगे। बहुत देर तक अश्रु गिरते रहने से ऐसा मालूम होता था कि मानों हृदय में अहिंसा को स्थान देकर हिंसा बाहर निकल रही हो। सिंह की यह दशा देख कर मुनि ने सिंह को अहिंसा अणुव्रत आदि व्रत ग्रहण कराए। अब सिंह सूखे पत्ते खाने लगा। अहिंसा का पालन करता हुए उनसे समाधिमरण किया और सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ।
यह तीनों प्रसंग चौबीसवें तीर्थंकर महावीर के जीवन के है। आप स्वयं सोचें कि कर्म के कारण एक जीव को क्या क्या सुख-दुख भोगने पड़े और अंत मे वह कर्म के जंजाल से निकल कर अहिंसा अग्रदूत बन कर परमात्मा बन गये। इन तीनों प्रसंगों को पढ़ने/सुनने के बाद आप ही तय करें कि प्राणी कर्म से बड़ा बनता है नाम, पद आदि से महान बनता है।

अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
(पच्चीसवां भाग)
20 अक्टूबर, 2020, मंगलवार, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

Related Posts

Menu