कर्म के उदय से बदलते हैं मनुष्य के भाव  – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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karm ke uday se badlate hai manushya ke bhaav

पद्मपुराण के पर्व 72 में रावण और सीता के संवाद से लगता है कि कर्म के उदय से क्षणभर में मनुष्य के कैसे भाव हो जाते हैं।

रावण ने जब बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर ली तो वह पुष्पक विमान बैठकर सीता के पास गया और कहने लगा कि मैं पापी हूं जो तुम्हें छल से हरणकर लाया हूं। यह कर्म मैंने कर्म उदय से ही किया है, मोह में आकर ही किया है। मैंने तो अनंतवीर्य मुनिराज से नियम लिया था कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी उसके साथ रमण नहीं करूंगा, इसीलिए मैं तुम्हारा इंतजार करता रहा। अब तो राम मेरे द्वारा मारा जाएगा इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार पुष्पक विमान में बैकठर सुमेरु पर्वत के शिखर, अकृत्रिम चैत्यालय आदि को देखकर अपने मन को प्रसन्न करो।

तब सीता रावण से कहती है कि रावण अगर तुम्हारी मेरे प्रति प्रीति है तो राम को युद्ध में मारने से पहले उन्हें मेरा संदेश जरूर देना। संदेश है कि सीता ने अभी तक प्राण इसी आशा में नहीं छोड़े हैं कि राम से मिलन अवश्य होगा। बस इतना कहकर सीता मूर्छित होकर गिर पड़ी। सीता की यह दशा देखकर रावण दु:खी हुआ और विचार करने लगा कि कर्मबन्ध के कारण सीता-राम स्नेह छूटने वाला नहीं है। मुझे बार-बार धिक्कार है कि मैंने यह निंदनीय कार्य किया है। मैं अत्यंत पापी हूं जो बिना कारण ही मैंने एक साधारण मनुष्य की तरह अपयश देने वाला काम किया है। मैने अपने कुल को मलिन किया है। मुझे ही समझ नहीं आ रहा कि यह कार्य मैंने कैसे किया? परस्त्री से मोह करने वाले का धर्म, अर्थ पुरुषार्थ नष्ट हो जाता है और वह अशुभ कर्मो की खान बन जाता है। यह सब सत्पुरूषों के करने योग्य कार्य नहीं है। जो सीता पहले मुझे सुंदर लगती थी अब वही मुझे अप्रिय लग रही है। मेरा विद्वान भाई विभीषण मेरे लिए अनुकूल था, मेरे हित की बात कहने वाला था। उसने भी मुझे समझाया था पर दुष्ट मन उस समय शांति को प्राप्त नहीं हुआ और उल्टा विकार भाव को प्राप्त हो गया।

यह सत्य है कि पुण्यात्मा मनुष्य का ही मन शांत होता है। इतना विचार करने के बाद रावण पुनः सोचता है कि कल तो मंत्रियों के साथ युद्ध की चर्चा की और आज अब कैसे मित्रता की चर्चा करूँ। मैं तो संकट में आ गया हूँ। अगर मैं अभी राम को सीता देता हूं तो लोग मुझे असमर्थ समझेंगे क्यों कि सब के चित्त को समझाना कठिन हैं। तो मैं राम-लक्ष्मण को युद्ध में जीवित पकड़ लूंगा और उसके बाद वैभव-सम्मान के साथ उसे सीता वापस कर दूंगा। ऐसा करने से दु:ख भी नहीं होगा और लोकापवाद भी नहीं होगा।

अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
अड़तालीसवां भाग
30 मार्च 2021, मंगलवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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