Antarmukhi LIVe : किचन को भोजनशाला बना लोगे तो हर रोग से लड़ जाओगे -अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर

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kichen ko bhojanshaala bana loge to har rog se lad jaaoge

भीलूड़ा (राज.) | महावीर जयंती पर आप सबने आराधना की है। हम जीवन में कुछ अच्छा कर जाएं और जीवन में पुण्य का संचय हो यह बहुत जरूरी है। महामारी चल रही है। पता नहीं कौन-कौन चपेट में आया है और पता नहीं कौन-कौन आएगा। कौन चपेट में आया यह रिकाॅर्ड तो है, लेकिन रोग की चपेट में आकर जाएगा कौन और कब यह कोई नहीं जानता।
हम जी तो रहे है, लेकिन जीना किसी को नहीं आता। अगर जीना आ जाता तो कोरोना जैसी महामारी से भी आसानी से मुकाबला कर लेते। हम जीने की कला नहीं सीख पाए। जीते तो सब है, तिर्यंच भी जीते है। लेकिन जीना महावीर जैसा होना चाहिए। हम 2600 साल बाद भी हम उन्हें याद करते है। हम उनका जन्मोत्सव मना रहे हैं। हम भी ऐसा ही जीवन जियें। महावीर जैसा जीने का पुरूषार्थ करें और उनके जैसा जीने के लिए हमें महावीर के उन सिद्धांतों को अपनाना होगा, जो खुद महावीर ने अपने जीवन में उतारे थे। ये सिद्धांत है सत्य, अंहिसा, अचैर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

महावीर ने अपने किसी को दु:ख नहीं दिया। यह जरूरी नहीं कि आप कुछ करो, लेकिन यह जरूरी है कि ऐसा कुछ मत करो कि जिससे किसी प्राणी की हिंसा हो रही है, किसी को दु:ख पहुंच रहा हो। यही महावीर का उपदेश हैं। जीवन में हम किसी का अच्छा नहीं कर पाएं तो कम से कम किसी का कुछ बिगाडें नहीं। किसी का कुछ करना है तो अच्छा ही करना है। बुरा किसी का नहीं करना है। यदि इस धर्म को अपना लेते तो आज इस कोरोना महामारी से दु:खी नहीं होते। आज कोई व्यक्ति कितना भी सक्षम हो, ज्ञानी हो, उसमें भी इस बीमारी का डर जरूर है।

महावीर ने यही कहा कि तुम अपने खाने की मर्यादा रखो। हम उनकी बताई आहारचर्या का पालन करते तो हम इस बीमारी से बहुत अच्छे ढंग से मुकाबला कर सकते थे। हमारे घर की रसोई बिगड गई है। आटा मसाला सब बाहर का खा रहे हैं। उनमें संक्रमण से बचाने की ताकत ही नहीं है। एक बूंद में असंख्यात जीव होते हैं। हम महावीर की वाणी को जीवन की दैनिक क्रियाओं में भी नहीं ला पाए है। इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। जब हम छोटी छोटी हिंसाएं करते हैं तो हम बडी हिंसा भी कर जाते हैं। महावीर कहते थे कि छोटी हिंसा ही बडी हिंसा बनती है। छोटा द्वेष ही बडा द्वेष बनता है। हमारा गेहूं और मसाले तक शुद्ध नहीं है। बर्तन भी स्टील के है जो एक तरह से लोहा है। हमारी रसोई में ही गडबड है। महावीर कहते थे, जितना जरूरत हो, उतना सामान रखे और हम रसोई में अति संग्रह करते हैं। सामान में दवाई डालकर रख देते हैं। हमारी रसोई जिस दिन शुद्ध हो जाएगी, उस दिन कितना भी बडा रोग आ जाए हम उससे लड़ लेंगे। आप अपनी रसोई सुधार लोगे तो महावीर के पांचों सिद्धांत हमारे जीवन में आ जाएंगे। रसोई को किचन कहते हो, जब नाम ही किच-किच है तो शुद्धता कहां से आएगी। आप चैके में खाना खाएं आपको बहुत स्वादिष्ट लगेगा, क्योंकि वहां भोजन में बहुत शुद्धता होती है। आज संकल्प करो कि आप अपनी किचन को भोजनशाला बनाआगे और जीवन में महावीर के सिद्धांतोें को उतारोगे।

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