श्रावक:-‘पाप कर्म के नाश के लिए दया धर्म जरूरी है’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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संसार में दुःख के कारण हैं पाप कर्म और मनुष्य अपने अंदर दया धर्म रख कर पाप कर्मों का नाश कर सकता है। दया कहो या करुणा एक ही बात है। कोई प्राणी शारीरिक, उमानसिक और स्वाभाविक दुःखों से दुःखी है तो उसे देखकर हमारा अन्तःकरण आर्द्र होना, दुखी होना यही दया धर्म का लक्षण है। दया धर्म परिवार, समाज और देश में व्यात्सल्य व प्रेम को बढ़ाता है। दया धर्म मनुष्यों को दूसरे प्राणियों की भावनाओं को समझने का अवसर देता है। एक दूसरे का सहयोग करने के लिए प्रेरित करता है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखता है। मांसाहार, शराब से दूर रखता है। शिकार नही करने संदेश देता है। जिनेन्द्र भगवान के उपदेश में अगर दया धर्म का वर्णन नही होता तो मानव धर्म समाप्त ही हो जाता। दया धर्म नही होता तो एक प्राणी दूसरे प्राणी को क्रूरता से देखता, क्रूरतता करता, चारों हो हाहाकार मच जाता। आज यदि मनुष्य गरीबों ,जरूरतमंदो के लिए रहने, भोजन, कपड़े, शिक्षा आदि की व्यवस्थाएं और गौशाला, पशु-पक्षी के चिकित्सालय आदि की व्यवस्थाएं कर रहा है तो वह दया धर्म के कारण ही कर रहा है। रक्तदान, नेत्रदान भी करुणा भाव के कारण ही हो रहे हैं। आप के पास समय नहीं तो आप तकनीक के माध्यम से भी वृद्धाश्रम आदि में धन आदि देकर दया धर्म का पालन कर सकते हैं।
भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, मदर टेरेसा, महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, विनोबा भावे आदि ऐसे अनेक नाम हैं जिन्होंने दया-धर्म के बल पर ही सारे संसार में अपना नाम रोशन किया। उनकी आभा, दीप्ति से सारा जग-संसार आज भी प्रकाशमान है। ऐसी महान विभूतियों के आदर्शों का अगर हम अनुसरण व अनुकरण करें तो संसार में कोई समस्या ही नहीं रहे।
“सर्वे भवंतु सुखिन, सर्वे संतु निरामया” की भावना से संसार में सर्वत्र हरियाली व खुशहाली जैसा माहौल बन जाएगा। कहा भी गया है कि मानवता दुनिया को एकजुट रखने वाली ताकत है।
पंचविशंति ग्रंथ में भी कहा है कि –
मूलं धर्मतरोराद्या व्रतानां धाम संपदाम गुणानां निधिरित्यङ्गिदया कार्या विवेकिभि।38।
अर्थ – प्राणिदया धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है, व्रतों में मुख्य है, संपत्तियों का स्थान है और गुणों का भंडार है। इसलिए उसे विवेकी जनों को अवश्य करना चाहिए।

अनंत सागर
श्रावक
(उनतीसवां भाग)
18 नवम्बर, 2020, बुधवार, बांसवाड़ा

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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