आदिनाथ से महावीर: मानव पुरूषार्थ से मानव कल्याण की यात्रा – मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज

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जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम और भगवान महावीर अंतिम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरूषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओ के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया, वहीं भगवान महावीर ने सत्य, अंहिसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्म्चर्य जैसा पंचशील का सिद्धांत दिया ताकि जीवन की व्यवस्थाओं को एक बार फिर व्यवस्थित किया जा सके और एक बेहतर समाज का निर्माण हो सके।
भोगभूमि से कर्मभूमि

अब तक अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। एक काल में 24 तीर्थंकर ही होते हैं। इस काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान और अंतिम चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी हैं। काल दो प्रकार के होते हैं। एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी। जो काल उत्थान से पतन की और जाता है वह अवसर्पिणी काल है। जो पतन से उत्थान की और जाए वह उत्सर्पिणी काल है।तो मौजूदा काल अवसर्पिणी काल है और इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और अंतिम तीर्थंकर महावीर हुए हैं।
भगवान आदिनाथ के जन्म से पहले तक भोगभूमि की व्यवस्था थी। जब उन्होंने जगत को पुरूषार्थ का ज्ञान दिया तब से कर्मभूमि की व्यवस्था शुरू हुई। भोगभूमि में पुरुषार्थ की आवश्यकता नही होती। उनमें सब कुछ कल्पवृक्ष से मिलता है। लेकिन कर्मभूमि में मनुष्य को पुरूषार्थ कर जीविकोपार्जन के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। यह कैसे करना है, जीवन जीने के तरीके क्या होने चाहिए और समाज में रहने हुनर क्या है, यह सब भगवान आदिनाथ ने बताया। उन्होंने परिवार को बढ़ाने के लिए विवाह पद्धति का वर्णन किया। सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया।
भगवान आदिनाथ ने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी। जो लोग विपत्ति के समय मनुष्यों की रक्षा करने के नियुक्त किए गए थे वह क्षत्रिय कहलाए। वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदि के व्यापार में जो लगे थे वे वैश्य कहलाए। जो निम्नस्तर का कार्य करते थे तथा धार्मिक शास्त्रों से दूर भागते थे वह शूद्र कहलाए। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने पूजा, पाठ करने वाले और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इस प्रकार से जैन धर्म में चार वर्ण की स्थापना उल्लेख मिलता है। संस्कारो के बीजरूप का शंखनाद करते हुए आदिनाथ भगवान ने अपने पुत्र को अपने हाथों से जनेऊ संस्कार किया। जनेऊ संस्कार का मतलब होता था कि अब यह मद्य, मांस, मधु, बड़, पीपल, कटुम्बर, अंजीर, गूलर आदि का सेव नहीं करेगा। जनेऊ पहनने वाला ही जिनेन्द्र की पूजा, अभिषेक कर सकता है क्यों कि वह अष्टमूलगुणो का पालन करने वाला है।
भगवान आदिनाथ ने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या जैसे छह कमों को आजीविका का साधन बताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि इससे दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन हो। मनुष्य एक-दूसरे के जीवनयापन में सहयोगी बन कर सामाजिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनें। अजीविका का अर्जन करते समय भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे इसके लिए छह आवश्यक कर्म देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, त्याग(दान) बताए, ताकि इनके माध्यम से मनुष्य धर्म ध्यान कर पुण्य का संचय कर सकें और जीवन में जो अशुभ कर्म का बन्ध किया है उनका नाश कर सके।
समाज में स्त्रीशिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या सिखाई। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था। इसी तरह जीवन में कलाओं के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने 72 कलाओं का उपदेश भी दिया है। तो इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य को भोगभूमि से कर्मभूमि में लाकर भगवान आदिनाथ ने पुरूषार्थ का उपदेश दिया और उस व्यवस्था का निर्माण किया जो आज तक चली आ रही है तथा जीविकोपार्जन के मूल सिद्धांतों में शामिल है।

मानव समाज को दिया पंचशील का सिद्धांत

जब इस धरती पर चारों ओर हिंसा का तांडव मचा हुआ था। मनुुष्य एक दुसरें को मारने के लिए आतुर थे। चारों ओर हिंसा की आग में, राग-द्वेष की भावना मेें, इष्र्या की लपटों में, क्रोध, मान, माया, लोभ में प्राणी मात्र जल रहा था। तब इस विश्व में वैशाली राज्य में अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने अपने आचरण, चर्या, उपदेश के माध्यम से जीओं और जीने दो, अहिंसा परमों धर्म यह दो मुख्य उपदेश दिए। महावीर ने मानव को अपने और समाज के कल्याण के लिए अंहिसा ही नहीं बल्कि सत्य, अस्तेय यानी चोरी ना करना, अपरिग्रह यानी जरूरत से ज्यादा वस्तुओ का संग्रह नहंीं करना और ब्रह्म्चर्य यानी संयम के साथ जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। ये ऐसे सिद्धांत है, जो आज के भोगवादी समाज में शांति की सबसे बड़ी कुंजी हैं।
भगवान महावीर ने संदेश दिया की समस्त आत्माएं एक समान हैं। धर्म करने का सबको समान अधिकार हैं। सब अपनी-अपनी क्षमता एवं मर्यादाओं में रह कर अहिंसा के साथ धर्म की परिपालना करें। उन्होंने अपने उपदेश में स्पष्ट कहा था कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। एक बार कुमार वर्धमान की मां त्रिशला दर्पण के सामने बैठ कर फूलों से अपना श्रंृगार कर रही थी। इतने में कुमार वहां आ गए और दृष्य देखा तो बोले मां यदि मेरी गर्दन कांट कर किसी के गले में लटका दी जाए तो आपकों कैसा लगेगा। मां बोली बेटा आज तू कैसी बात कर रहा है। वर्धमान बोले मां जब ये फूल तोड़ा गया होगा तो उस वृक्ष की आत्मा कितनी दुखी हुई होगी। आपने अपनी सुन्दता के लिए इन निरीह फूलों की हत्या कर दी। इसे प्रभु की उपासना के लिए तोडा होता तो ठीक था, लेकिन खुद के भोग के लिए तोड़ना सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार से भगवान महावीर के विचार प्राणी मात्र के लिए सुख, शांति की कामना करते थे। आज हम वर्तमान की छोड़ भूत, भविष्य की कल्पना करते हैं जिससे राग, द्वेष की आग हमारे अन्दर जलने लगती है। आत्मिक शांति नष्ट हो जाती हैं। ये शांति वापस तभी आ सकती हैं जब हम प्रत्येक प्राणी में अपने आपकों देखेंगे। यही भगवान महावीर का संदेश व सिद्धान्त था। इसी उपदेश को जीवन में उतारने का संकल्प हम सब आज महावीर जयंती पर करें। तभी हम बदल सकते हैं। ‘हम बदलेंगे तो विश्व अपने आप बदल जाएगा’

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