भाग पाँच : मैं…मुनिभक्त रावण! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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रावण @ दस : भाग पाँच

मैं और मेरा परिवार मुनिभक्त था। हम सदा मुनिसेवा और उनके उपदेशों को ग्रहणकर नियम पालन किया करते थे। मैं अभिमानी भी नहीं था। जब कभी मुझसे अशुभ कर्म के उदय के कारण कोई अशुभ कार्य हुआ तो उसका मैंने प्रायश्चित भी किया। मेरे जीवन में अमिट छाप छोड़ चुके ऐसे ही दो संस्मरण मैं आपको सुना रहा हूं।

मुझे जब कभी मुनि सम्बंधी समाचार मिलता, तब मैं समय मिलते ही उनकी वंदनार्थ पहुंच जाता था। मैं जिनेन्द्र भगवान की वंदना करके वापस आ रहा था तभी मुझे मंत्री मारीची से मालूम हुआ कि यहीं पास में सुवर्णगिरी पर मुनिराज अनंतबल को केवलज्ञान हुआ है तो मैं सपरिवार उनकी वंदनार्थ वहां पहुंचा। धर्मचर्चा के दौरान मुनिराज ने कहा, मुनि की मन, वचन, काय से निन्दा करने वाला संसार में निन्दा का पात्र बनता है। दीन -हीन तथा अन्धों को करुणा दान देना चाहिए । परस्त्री सेवन करने से व्यक्ति ही नहीं, उसका कुल भी नाश को प्राप्त हो जाता है। मद्य, मधु, मांस, जुआ, एवं रात्रि भोजन त्याग करने से व्यक्ति स्वर्ग के सुख प्राप्त करता है। जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करने वाला व्यक्ति सर्वाधिक पुण्य का बंध प्राप्त करता है। अधिकांश नियमों का पालन मैं करता ही था, तब मुनिराज के समक्ष कौनसा नियम लूं। ऐसा विचार कर मैंने किसी भी स्त्री को उसकी रजामंदी के बिना स्पर्श नहीं करने का नियम धारण किया। मैं राजा था और यह नियम मेरे लिए उपयुक्त था। मैंने इस नियम का पालन सदैव किया और शायद इसी कर्म की गति से घोरतम पापकर्म करने से बच गया। केवलज्ञानी गुरुवर के समक्ष मैंने ही नहीं, मेरे परिवार के सभी सदस्यों ने शक्ति अनुसार नियम ग्रहण किए।

दूसरा संस्मरण है- मेरी आत्मग्लानि का, जो आपको बताएगा कि मैं अहंकारी नहीं था। एक समय की बात है। मेरे कर्मों की गति और पूर्व बैर-भाव में आकर कैलाश पर्वत पर तप, ध्यान और साधना कर रहे बाली मुनिराज की साधना भंग करने के लिए मैंने पर्वत को अपने हाथ में उठा तो लिया लेकिन मुनिराज के तप के बल से धीरे-धीरे मेरा उसको उठाना मुश्किल होता जा रहा था। मुझे उसी समय अपनी अज्ञानता का ज्ञान हुआ और घोर पछतावा हुआ। मैं खुद से ग्लानि करने लगा। मैं तुरन्त मुनिश्री के चरणों में पहुंचा और उन्हें नमन कर प्रायश्चित के भाव प्रकट किए। मैंने निवेदन किया कि मुनिराज आप गुणों की खान हो, आप जैसे धैर्यवान, शीलवान तपस्वी को मेरा प्रणाम है। आप मुझे क्षमा करें, दया करें जो मैंने आपके साथ किया है। वह पाप बन्ध का कार्य है , दुख देने वाला है, आपका अशीर्वाद ही मुझे इस पाप बन्ध से दूर कर सकता है। मैं अपनी स्वयं की निन्दा करता हूँ। मैं पापी हूं, दुष्ट हूं, अज्ञानी हूं, इस प्रकार बोलते हुए मैंने मुनिश्री की तीन प्रदक्षिणा कर उनसे क्षमायाचना की।

मेरे कर्म के उदय से मैंने गलती की, पर तत्क्षण अपनी भूल का अहसास होते ही उसे स्वीकार भी किया और क्षमायाचना भी की। अब आप ही बताएं, मैं अहंकारी होता तो क्या अपनी भूल स्वीकारता। आज मुझे जलाने वाले तुम क्या अपनी गलती स्वीकारते हो? क्या तुम अपने अहं की तुष्टि नहीं करते कि तुमने नाम के रावण को जला दिया जबकि बुराई का रावण तो तुममें जस का तस अट्टाहस करता हुआ जीवित है। मैं तो बस नाम का रावण था और अपने बुरे कर्मों की सजा निर्लिप्तता के साथ भुगत रहा हूं, वह भी निर्मल स्वभावी होकर… तभी तो तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध कर सका हूं। अभी भी समय है जाग जाओ, मुझसे कुछ तो सीख लो! मेरे जीवन चरित्र की अच्छाईयों को अपनाकर, मेरी तरह गलत कार्य न करने का संकल्प लेकर अपने कर्मों की निर्झरा का क्रम तो बांध लो… चलो कुछ नहीं तो अपने भीतर बैठे अहं को ही तिरोहित कर दो !

I Ravana, Devotee of Sages… – Antarmukhi Muni PujyaSagar Maharaj

Ravan@ten : Part Five

I and my family were devotees of Munis (sages). We always served them and followed the rules by listening to their sermons. I was not arrogant. Whenever I committed a sacrilegious act due to inauspicious karma, I sought atonement. I will narrate two such incidents which have left an indelible mark on my life.

Whenever I used to hear about holy men, I would pay them a visit soon as possible for prayers. I was returning from my prayers to Lord Jinendrawhen I came to know from Minister Marichi about Muni Anantbal having attained KevalJnan (omniscience) on Suvarnagiri. I, along with my family went to pay homage to him. During religious dialogue, the Muni said, “A person who deplores a saint through his mind, speech or actions becomes an object of condemnation himself. The destitute, underprivileged and blind should be shown compassion. Establishing illicit relations with another woman proves ruinoustoa person and his family. By relinquishing intoxicants, honey, meat, gambling and late night meals a person can achieve heavenly bliss. One obtains the greatest Punya (virtue) by performing Namaskar (salutation) to Lord Jinendra”. I used to follow most of these rules. I thought of adopting one rule in the presence of the Muni and hence I decided to follow the edict of not touching any woman without her consent. I was king and this rule was appropriate for me. I always adhered to it and because of it I was perhaps spared from committing the gravest offence. Not just me but all my family members adopted rules as per abilities before the omniscient Guru.

The second incident is about my penitencewhich reveals that I was not egotistical. Due to my karma and preconceived animosity I once tried to disrupt the Tapa(meditation) of Muni Baliby lifting the mountain when he was engaged in intense meditation and spiritual practice on Mount Kailash. However, due to the force of the Muni’s Tapa, it became increasingly difficult to hold. I immediately realized my ignorance and felt great remorse. I was filled with self-reproach. I bowed down before the Muni and expressed my feelings of repentance. “Great Muni, you are a treasure trove of many faculties. I bow before a serene, noble mystic like you. Please forgive and have mercy on me. What I have done with you is distressing and a grave sin and only your blessings can now deliver me from this. I denounce myself as vile, ignorant and a sinner”. Speaking thus I circumambulated the Muni thrice to seek his forgiveness.

I committed a mistake due to my karma but I instantly accepted it on realizing the error and begged for forgiveness. If I was arrogant would I have admitted my mistake? Those who burn me today, do you acknowledge your lapses? Do you not just appease your ego by burning Ravana, when the Ravana of malevolence is alive and well inside you? I only bear the name of Ravana, and am enduring the punishment for my evil deeds with a clear conscience. Consequently I have been able to set the path of becoming Tirthankar. There is still time. Wake up and learn from the chronicle of my life. By embracing righteousness and pledging to not commit offence, set your karma in the right path. At least extinguish the ego within you…

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