भाग आठ : मैं रावण… कुलधर्मी, सच्चा क्षमाधर्मी! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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रावण @ दस : भाग आठ

मैं रावण… मेरी दिग्विजय का लक्ष्य था- अपनी वंश परम्परा की राज्य नगरी लंका को पुन: प्राप्त करना। दिग्विजय मात्र शक्ति बढ़ाकर राजा इंद्र पर विजय प्राप्त करने के लिए थी, ना कि धनवृद्धि के लिए। आपको तो पहले ही बताया, राजा इंद्र ने ही लंका पर अधिपत्य स्थापित कर मेरे दादा सुमाली के भाई माली को मारा था और उन्हें लंका से बाहर कर दिया था। चूंकि विजयार्थ पर्वत का यह राजा स्वयं को साक्षात सौधर्म इंद्र, अपनी नगरी को स्वर्ग समझता था और अपने अधीनस्थ राजाओं को देव मानता था, इसलिए इसकी सेना देवसेना कहलाई। और तो और इसने अपने हाथी का नाम भी ऐरावत रख लिया था। और मैं राक्षस वंश का था तो मेरी सेना राक्षस सेना। इसलिए जब मैंने इस पर विजय प्राप्त की तो लोकव्यवहार में कहा गया कि मैंने स्वर्ग के इंद्र को जीत लिया जो गलत था। खैर, यहां यह महत्वपूर्ण नहीं। जब राजा इंद्र से युद्ध के दौरान दोनों ओर के सैनिक बड़ी संख्या में आहत होने लगे तो मैंने स्वयं अकेले ही इंद्र को युद्ध के लिए ललकारा। वैसे भी मैंने दिग्विजय के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया था कि मैं किसी भी राजा को ऐसे ही बंदी बना लूं कि सैनिकों को युद्ध में प्राण न गंवाना पड़ें। यहां भी ऐसा ही सोचा। हम दोनों के बीच भयानक युद्ध हुआ। अंत में वह समय आ ही गया, जब मैंने इंद्र को बंदी बना लिया और अपनी लंका को वापस प्राप्त कर लिया। अठारह साल तक दिग्विजय के सफर के बाद हमें यह दिन देखने को मिला जब मेरी वंश परंपरा की नगरी और राज्य मेरा था।

राजा इंद्र के पिता सहस्त्रार मेरे पास आए। उनको मैंने विनयपूर्वक सम्मान दिया। जब उन्होंने इंद्र को बंधनमुक्त करने को कहा तो मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा, आप मेरे पिता तुल्य हैंइसलिए इंद्र मेरा चौथा भाई है। वह जितना चाहे राज्य ले और राज्य करे। मुझे तकलीफ नहीं। मुझे तो बस मेरे वंश की राज्यस्थली लंका नगरी वापस मिल गई और मुझे कुछ नहीं चाहिए। वैसे भी मैं दिग्विजय के बाद प्रत्येक राजा को उसका राज्य शासन करने को देता आया हूं। उस समय मेरे एक शत्रु का पिता मेरी प्रशंसा कर रहा था और मैं अपने शत्रु को क्षमा कर रहा था। मैंने इंद्र को छोड़ दिया और लंका विजय पर उत्सव हुआ। मेरे दादा सुमाली ने उस उत्सव के दौरान बताया था कि एक मुनिराज ने कहा था कि रावण ही तुम्हें लंका वापस दिलवाएगा… और हुआ भी वही। इसका मतलब यह मेरा कर्तव्य कर्म था, इसलिए मैंने दिग्विजय हासिल की। यही मेरी धर्म कुलधर्म भी था । आपसे एक प्रश्न करूँ… आपमें से कौन है जो अपने शत्रु के पिता को सम्मान दे और यही नहीं, शत्रु को क्षमा कर उसे राज्य संपदा भी दे दे। अरे आप तो शत्रुता इस प्रकार निभाते हो कि अपने दुश्मन के घर-परिवार , नाते-रिश्तेदारों और संतानों से भी शत्रुता का भाव जीते हो… बोलो, मैं था ना कुलधर्मी और क्षमाधर्मी! मेरा पुतला जलाकर क्यों अपने कर्मों की गति खराब कर रहे हो। समझ ही नहीं पाता कि यह देखने के बाद कि मेरे एक अवगुण ने मेरे हजार सद्गुणों का तेज धूमिल कर दिया, फिर भी तुम कोई शिक्षा ग्रहण नहीं कर रहे…मैं सही में तुम्हारे लिए अत्यंत दु:खी होता हूं।

I Ravana… magnanimous and dutiful to my ancestors – Antamukhi Muni Pujya Sagar Maharaj

Ravan@Ten : Part Eight

I am Ravana… the goal of my conquests was to reclaim Lanka, the traditional seat of power of my dynasty. The objective of world conquest was not to amass wealth but to achieve victory over King Indra by acquiring power. As you are aware, King Indra banished my grandfather Sumali from Lanka and killed his brother Mali to establish supremacy over the city. This king of Mount Vijayartha used to regard himself as the righteous Lord Indra, his city as Swarga (heaven) itself and the kings under his influence as Deva (gods). So his forces came to be known as Deva Sena (army of the gods). He even named his elephant Airavata. My troops were called Rakshasa Sena since I was from the Rakshasa dynasty. Therefore when I triumphed over him, it (inaccurately) became folklore that I had won over Lord Indra of Swarga (heaven).

Anyway this is not important. During battle with King Indra when both sides started to suffer large number of casualties, I challenged Indra to a duel.During my conquests I had always taken special care to capture the enemy king with minimal loss of lives. This was my plan here as well. A fierce battle ensued between us and I finally vanquished Indra and reclaimed Lanka. After eighteen years of conquests we finally witnessed the day when I took control of the city of my ancestors and my kingdom.
I paid my respect to King Indra’s father Sahastrar who had come to visit me. When he asked to free Indra I said “I will obey your command. You are like a father to me and so Indra is my fourth brother. He can reclaim as much territory as he wishes and can rule over it. I have no objections. Lanka, seat of power of my ancestors’ realm has been restored. This is all I desire. After every conquest I have allowed the kings to administer their respective domains”. At that moment I was pardoning my enemy and my enemy’s father was praising me. I freed Indra and we celebrated Lanka victory. My grandfather Sumali told me that a sage had prophesized that Ravana would reclaim Lanka, which was fulfilled. This was my duty and hence I was able to fulfil my destiny of world conquest. This was also my obligation towards my ancestors. I would like to ask you…,who among you would bestow honour upon your enemy’s father, pardon him and donate your territory? Instead you bear so much animosity that you carry ill-will towards your enemy’s family, relatives and children. I was magnanimous and dutiful to my ancestors.

Why do you ruin your karma by burning me? I fail to understand that even after realizing that my one flaw eclipsed my thousand virtues, you do not learn this lesson. I truly feel sorry for you…

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