भाग चार : मैं मातृ-पितृ भक्त था और दृढ़ निश्चयी भी! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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रावण @ दस : भाग चार

विद्याएं और सिद्धियाँ प्राप्त करने को की तपस्या

मेरे व्यक्तित्व का एक और अच्छा पहलू था। मैं माता-पिता का सच्चा भक्त था। उनकी आज्ञा का पालन सदा करता था और जो जीवन में ठान लेता, उसे करके ही दम लेता था यानि दृढ़ संकल्पित था। मां बताया करती थीं कि राजा इंद्र ने मेरे दादा सुमाली के भाई राजा माली को मारकर लंका पर आधिपत्य स्थापित किया और उन्हें लंका से निकाल दिया, तभी से वे अलंकारोदयपुर (पाताल लंका) में रह रहे थे। मेरे पिता को मैंने बचपन से ही चिंतित देखा, उनकी चिंता का विषय था कि लंका को पुन: कैसे हासिल किया जाए। तब मां के कहने पर भानुकर्ण, विभीषण और मैं, हम तीनों भाई भीमवन में तपस्या के लिए संकल्पित हो साधना करने लगे। मैंने सबसे पहले एक लाख जाप कर सर्वकामान्नद विद्या सिद्ध की जिससे मनचाहे अन्न प्राप्त किए जा सकते थे। इसके बाद सोलह अक्षर वाली विद्या सिद्धि के दौरान जम्बूद्वीप के अधिपति अनावृत यक्ष और उसकी पत्नियों ने विघ्न ड़ालना प्रारंभ कर दिए। मुझे विचलित करने के लिए यक्ष ने पहाड़, सर्प, हाथी, अग्नि, समुद्र आदि का रूप धरा, पर मैं जस का तस साधनारत रहा। उसने अपनी विद्या के बल से मेरे दोनों भाइयों के सिर काटकर मेरे सामने रख दिए, इस पर भी जब अडिग तो उसने मेरी बहन चन्द्रनखा का धर्म भ्रष्ट करने और माता-पिता एवं भाइयों को पीड़ा पहुंचाने का स्वांग रचा। पर मैं साधना में लीन रहा।
मेरे मन में यह दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर भक्ति में रत साधकों के साथ कुछ भी बुरा हो ही नहीं सकता। यक्ष के सभी प्रयास विफल रहे और मेरी सभी विद्याएं सिद्ध हो गई।

इसके बाद यक्ष ने भी प्रसन्न होकरमुझे कई वरदान दिए। मैंने संचरिणी, कामदायिनी, कामगामिनी, दुर्निवारा, जगत्कम्पा, प्रज्ञप्ति, भानुमालिनी, अणिमा, लघिमा, क्षोभ्या, मन:स्तम्भनकारिणी, संवाहिनी, सुरध्वंसी, कौमारी, वधकारिणी, सुविधाना, तपोरुपा, दहनी, विपुलोदरी, शुभप्रदा, रजोरूपा, दिनरात्रिविधायिनी, वज्रोदरी, समाकृष्टि, अदर्शनी, अजरा, अनलस्तम्भिनी, तोयस्तम्भिनी, गिरिदाराणी, अवलोकिनी, अरिध्वंसी, घोरा, धीर, भुजंगिनी, वारुणी, भुवना, अवध्या, दारुणा, मदनशिनी, भास्करी, भयसंभूति, ऐशानी, विजया, जया, बन्धनी, मोचनी, वाराही, कुटिलाकृति, चित्तोद्भवकारी, शांति, कौबेरी, वशकारिणी, योगेश्वरी, बलोत्सादी, चण्डा, भीति और प्रवर्षिणी आदि १८ हजार महाविद्याओं और सिद्धियों को हासिल किया।

एक बात बताओ… इतनी सिद्धियां तो वही सिद्ध कर सकता है जिसने पूर्व भव में अच्छे कर्म किए हों, जिसका वर्तमान में पुण्योदय चल रहा हो और जो पुण्यात्मा हो? मानता हूं, मुझसे बुरे कर्म हुए हैं, पर अच्छाई और बुराई तो हर जीव के साथ चलती है। सच्चा तो वही है जो अपने बुरे कर्मों से सबक ले और दूसरों को ऐसा ना करने की प्रेरणा दे। मैं भी संसार को बुरा न करने की ही प्रेरणा दे रहा हूं। सच कहूं, मेरी तपस्या पर अनेकों आचार्य भगवन कहते हैं कि यदि इतनी घोर तपस्या किसी मुनि ने की होती तो उसे मोक्ष मिल गया होता। सोचिए, मेरे पापकर्म कम हैं और पुण्यकर्म अधिक, मैं तो अपने अशुभ कर्मों का फल भोगने के बाद पुन: तपस्या करके अपने पुण्य प्रताप से मोक्ष प्राप्त करूंगा ही, साथ ही तीर्थंकर पद को भी प्राप्त हो जाऊँगा! पर क्या, आप मेरा पुतला जलाकर मोक्ष के अधिकारी हो जाएंगे? नहीं, बिलकुल नहीं आप तो बस अपने अंदर के अशुभ को नष्ट करो, उसका दहन करो… तभी आप जीवन का मूल लक्ष्य प्राप्त कर सकोगे।

I was devotee to my parents and determined as well! – Antarmukhi Muni Shri Pujya Sagar Maharaj

Ravana@ten : Part Four

One more quality of my life was that, that I was a true devotee of my parents. Always used to obey their orders and never rest till I achieve the goal, I have set i.e I was fully determined. My mother used to tell me a story that king of deities DevrajIndra occupied Lanka after killing my Grand Father Raja Sumali’s son Mali and throw them out from Lanka. Since then they were living in Alankarodaypur (the underground Lanka). I have always seen my father worried about taking lanka back. Then Bhanukarna, vibheeshana and I started mortification in Bheemvana. First I achieved the knowledge of Sarvkamanand. Using it one can get the desired grain. After it, when I was praying for 16 letters the owner of Jambudweep Anavratyaksha and his wives started disturbing.

Yaksha came as mountain, snake, elephant, Fire, Sea etc. But without getting disturbed I was praying consistently. He did cut heads of both of my brothers and kept them in front of me, even then I was firm. Then he created a drama to spoil my sister chandranakha and to panic my parents and brothers. But even then I was devoted to my prayers, I was with the bele that nothing bad can be happen to a person praying to the almighty God.Yaksha was fail in his bad attempts and I attained all my knowledge. After it, Yaksha himself gave me several wishes.

I attained 16,000 Mahavidya and Sidhdhis. Some of these are-Sancharini, Kamgamini, Durniwara, Jagatkampa,Pragyapti,Bhanumalini, Anima, Laghima, Kshobhya, Manahstambhkarini,Sanwahini, Surdhwansi, Kaumari, VAdhkarini, Suvidhana, Tporupa, Dahni,vipulodari, Shubhprada,Rajorupa, Dinratrividhayini, vajrodari, Samakrishti, Adarshani, Ajra, Anlastambhini,Toyastambhini, Giridarani,Avlokini,Aridhwansi,Ghora, Dheer, Bujangini, Varuni, Bhuvana, Avadhya,Daruna, Madanshini,Bhaskari, Bhayasambhuti, Aishani, Vijya, Jaya, Bandhani, Mochni, Varahi, kiutilakruti,Chittoudbhavkari, Shanti, Kauberi, Vashkarini, Yogeshwari, Balotsadi, Chanda, Bheeti, Pravarshini etc.

Tell me one thing…So much powers can only be attain only by a person who has done Good Karma in his previous life. Who is at the rising level of charity and a person with a soul of saint? I agree that I have done a lot bad Karma. But Goodness and badness is always with a life. The real true man is one, who learns from bad Karma and not let others do the bad. I am as well inspiring the world not to do bad. I am also inspiring the world to stay away from bad.

Several acharya say that if any Muni had done such tough mortification, then he might have get Moksha. Think that my sins are less than my charity and good Karma. So after got punished for my bad Karma I will again be on mortification and would get the Moksha and be a Tirthankar as well! But will you get Moksh after burning my effigy? No, absolutely not. Just destroy the bad in you, Burn it….and…only then you would attain the original aim of your life.

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