कहानी : मुनि सेवा का फल बिना मांगे ही मिल जाता है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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muni seva ka phal bina maange hi mil jaata hai

मुनि की सेवा का फल बिना मांगे ही मिलता है। पद्मपुराण के पर्व 61 में राम के जीवन एक प्रसंग है जो मुनिसेवा के फल को बताता है।

प्रसंग इस प्रकार है

रावण से युद्ध चल रहा था। उस समय रावण के योद्धाओं ने राम के पक्ष से युद्ध कर रहे सुग्रीव और भामण्डल को नागपाश से बाँध दिया। यह सुनकर राम, लक्ष्मण, हनुमान आदि वहां पहुंचे जहां पर इन्हें नागपाश से बांधा गया था। नागपाश एक विद्या है जिससे व्यक्ति जीते मरनासन्न जैसा हो जाता है। राम, लक्ष्मण के वहां आते ही गरुड़ अस्त्र के कारण सुग्रीव और भामण्डल नागपाश से मुक्त हो कर खड़े हो गए। तब सब ने पूछा यह सब कैसे हुआ? आपके पास यह दिव्य शक्ति कहाँ से आई।

तब राम ने कहा कि एक बार पर्वत पर देशभूषण-कुलभूषण दो मुनिराज ध्यान कर रहे थे और उन पर उपसर्ग हो रहा था। हमने उसे दूर किया और उसी समय उन दोनों मुनिराजों को केवलज्ञान हुआ। सभी देव उनकी पूजा, वंदना करने आए थे। उसी समय गरुडेन्द्र भी वहां आया। वह हम से प्रसन्न हुआ। उसी से यह गरुड़ अस्त्र की विद्या प्राप्त हुई और यह नागपाश का बंधन खुल गया।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि मुनिसेवा से बड़ा कोई धर्म नही है। उनकी सेवा से जो पुण्य मिलता है वह सब दुःखों को दूर कर देता है।

अनंत सागर
कहानी
छयालीसवां भाग
14 मार्च 2021, रविवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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