पाप से बचने का प्रण करें – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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बच्चों, जाने-अनजाने में भूल सबसे होते है। कई बार वह भूल बड़ी होती है। उसका जो फल हमें मिलता है, उससे दुख होता है। दुख से बुरे विचार का जन्म मन-मस्तिष्क में होता है। फिर हमारी सोच भी नकारात्मक दिशा में बढ़ जाती है। और नकारात्म सोच ही पाप का सबसे बड़ा कारण है। नकारात्मक सोच से बचने, पाप कर्म से स्वयं को रोकने और यदि पाप हो जाए तो उसका प्रायश्चित कैसे हो! यह सब आप को बताऊंगा। आप सुनना पसंद करेंगे न।
फिर आप ध्यान से पढ़ना और दूसरों को भी पढ़ाना-सुनाना। तो पढ़ने से पहले एक वचन देना होगा। वह यह कि पढ़ने के बाद इन संकल्प को स्वयं पर लागू करेंगे। अब आप पढ़ें कि क्या संकल्प लेना है। यदि इन संकल्पों को करते हो तो स्वयं को, परिवार को, समाज को और देश को स्वच्छ, निर्मल करने में कारण बनोगे। यही पूण्य का साधन भी है।
• कभी भी भगवान, गुरु और धर्म ग्रंथों का अपमान नहीं करूंगा।
• कभी किसी की हंसी नही उड़ाउंगा या अपमान नही करूंगा।
• गरीबी और अमीरी का भेद नही करूंगा।
• प्रतिवर्ष एक पौधा लगाऊंगा और अपने आस-पास गंदगी नहीं होने दूंगा।
• शाकाहार का सेवन करूंगा और दूसरों को करने के लिए प्रेरित करूंगा।
• दूसरों की कमी नहीं देखूंगा। साथ ही माता-पिता और गुरुजनों से झूठ नही बोलूंगा।
• प्रतिदिन माता-पिता के चरण स्पर्श करूंगा और सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण व माता सरस्वती की अराधना करूंगा।
• हिंसा, झूठ, चोरी का विचार नहीं आने दूंगा।
• किसी एक महापुरुष के जीवन-चरित्र को पढूंगा या सुनुंगा।
• किसी एक इच्छुक (जरूरतमन्द) को भोजन करारूंगा। साथ ही आने खर्चे के रुपय में से दान करूंगा।
• कभी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचूंगा। न बोलूंगा, न ही सुनूंगा।

अनंत सागर
26 सितम्बर 2020, शनिवार, लोहारिया
पाठशाला
(बाईसवां भाग)

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