मति भ्रष्ट करता है शराब का सेवन -अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

label_importantश्रावक

इतिहास के पन्नों को पढ़ें तो पता लग जाएगा कि भारत को गुलाम शराब जैसी नशीली चीजों ने ही बनाया है। वर्तमान में हम देख रहे है अच्छे-अच्छे पढ़े लिखे व्यक्ति शराब के नशे में आकर अपराध और आत्महत्या जैसे निंदनीय कार्य कर जाते है। आज शराब (मद्य) के साथ ही अन्य अनेक प्रकार के नशे से परिवार, समाज और देश के साथ हमारी संस्कृति -संस्कारों का नाश हो रहा है। धर्म के अनुसार तो शराब का सेवन करने वालों को असंख्यात जीवों को मारने का दोष लगता है। लौकिक व्यवहार में लाज-शर्म आदि नही रहती है। शराब पीने वाले मनुष्य योग्य-अयोग्य, हित-अहित का कोई विचार नही करते है। क्या करना चाहिए, क्या नही करना चाहिए आदि किसी भी प्रकार का विवेक नहीं रहता है। शराब (मद्य) सेवन करने वाले मनुष्य की मति भ्रष्ट हो जाती है। जिसकी मति भ्रष्ट हो जाती है, वह हर तरह का पाप कर्म कर सकता है। हर तरह के दुर्वचन बोल सकता है और किसी भी तरह के कुमार्ग पर जा सकता है। कहने का मतलब है कि वह मनुष्य सभी प्रकार के अनर्गल करने लगता है।
एक गुणी ब्राह्मण गंगा-स्नान के लिए जा रहा था। किसी वन-प्रदेश में शराब के नशे में चूर हंसी-मजाक करने वाले स्त्री सहित भील ने उसे रोक कर कहा कि मांस खाओ, शराब का सेवन करो भीलनी के साथ प्रेम करो। इन तीनो में से कोई एक कार्य तुम्हें करना होगा। अन्यथा मैं तुमको मार डालूंगा। ब्राह्मण को समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ और क्या नही करूँ। उसने विचार किया कि प्राणी का अंग होने के कारण मांस-खाने पर तो पाप लगेगा, भीलनी के साथ प्रेम करने पर मेरी जाति का नाश हो जाएगा। अन्न की पीठी (पानी के साथ पीसा अन्न) गुड़, धातकी के फूल आदि से बनी शराब निर्दोष है इसलिए शराब ही पी लेता हूं। इस प्रकार विचार कर उसने शराब पीना स्वीकार कर लिय। लेकिन शराब पीते ही उसकी मति भ्रष्ट हो गई। उसने भीलनी के साथ प्रेम भी कर लिया और मांस का सेवन भी कर लिया। आज के उदाहरण तो आप खुद देख रहे हैं। आप स्वयं समझ लें कि शराब का सेवन कैसे हमारे अस्तित्व को ही समाप्त कर देता है।

अनंत सागर
श्रावक
( तेईसवां भाग)
7 अक्टूबर, 2020, बुधवार, लोहारिया
मति भ्रष्ट करता है शराब का सेवन
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

Related Posts

Menu