सातवां दिन : स्व-कल्याण के लिए है मेरा चिंतन, इसे पर-कल्याण समझना मेरी भूल – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मेरी मौन साधना का सातवां दिन है और इस दिन मैं अपनी एक भूल आप सभी के समक्ष स्वीकार करना चाहता हूं। यह मेरी भूल ही थी कि जो मैं यह समझता रहा कि मैंने आज तक भी जो पढ़ा, लिखा और सुना… वह दूसरों के लिए ही था क्योंकि मेरे मन में तो यही भाव का था कि मेरा सर्वस्व दूसरों के लिए है, मेरा जीवन समस्त जीव मात्र के कल्याण के लिए है। इसीलिए मैं स्वयं के द्वारा अर्जित इस ज्ञान को सभी में बांटने की कोशिश में भी था। मैं मन ही मन न जाने क्या-क्या विचार किए जा रहा था। आज के चिंतन में मेरा सामना एक अकल्पनीय सच्चाई से हुआ और मैं यह स्वीकार करने की हिम्मत भी जुटा रहा हूं कि मैं आज तक गलत था क्योंकि मैं जिस मार्ग पर चल रहा हूं, वह तो स्व-कल्याण का मार्ग है यानी मेरा चिंतन, मेरे अपने लिए है, पर-कल्याण के लिए नहीं। इसी चिंतन के बीच मेरी स्मृति में एक प्राचीन प्रसंग कौंध आया। प्रसंग यूं था कि एक बार भगवान आदिनाथ मुनि बनकर आत्म साधना में लीन थे। उनके साथ उनके परिजन भी आत्म साधना में लगे हुए थे लेकिन भगवान अदिनाथ का पोता मारीचि मिथ्या मत का प्रचार कर रहा था। भगवान ने उसे बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया, न ही उसे कोई उपदेश दिया, वह तो बस अपनी साधना में लीन रहे। इस घटना के मन में प्रस्फुटित होते ही मुझे भी यह अहसास हुआ कि क्या मैं दूसरों के लिए पढ़ रहा हूं, आत्मा ने जवाब नहीं में दिया। मैं भी तो भगवान आदिनाथ के बताए मार्ग पर ही चल रहा हूं। अपने पढ़े-लिखे और समझे हुए ज्ञान में से कुछ अंश के प्रकाशन या उसे दूसरों को बताने की यात्रा के दौरान मैंने अपनी आत्मा के स्वभाव को कई बार छोड़ा है। न जाने कितनी बार दूसरों के प्रति राग-द्वेष का भाव उत्पन्न हुआ है और न जाने कितने बार मैंने क्रोध, मान, मायाचार और लोभ किया है। ऐसा भी बहुत बार हुआ है कि मैंने खुद को पीड़ा में डाला।

ये सभी चीजें मैं बीते 20 वर्ष से धर्म के मार्ग पर अनवरत चलते हुए अज्ञानतावश करता रहा हूं और शायद यही कारण रहा कि आज तक मैं अपने आप को संभाल नहीं पाया हूं अर्थात मन, वचन और काय को स्थिर नही कर सका हूं। भगवान आदिनाथ के इस प्रसंग ने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। मुझे अंदर ही अंदर पछतावा होने लगा। मेरे भीतर अपनी इस भूल को सुधारने को लेकर तड़प उत्पन्न हो गई। घंटों निकल गए, मैं बस अपनी आंखें बंद किए बैठा रहा, इस बीच बहुत से विचार आए-गए लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ और फिर अचानक चिंतन में उजाले की एक किरण दिखाई दी। मुझे अहसास हुआ कि मैंने जो भी अब तक पढ़ा है, जो मैं पढ़ रहा हूं, उसे दूसरों को बताने या प्रकाशन के जरिए बड़े जन समुदाय तक पहुंचाने का भाव मन में आने ही नहीं देने का पुरुषार्थ करूंगा। मुझसे जो सहजता से होगा, उसे अपनी आत्मा से स्वीकार करूंगा।

बुधवार, 11अगस्त 2021, भीलूड़ा

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