विवाह को भोग नहीं, धर्म का आधार मानो

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vivah ko bhog nahi dharm ka aadhar maano

भीलूड़ा/सागवाड़ा – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने शुक्रवार को श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज विवाह का महत्त्व कम होता जा रहा है, जिसके कारण सामाजिक स्थिति-परिस्थिति बदल गई है। परिवार के रहने, बोलने, खाने से भारतीय संस्कृति-संस्कार लुप्त होते जा रहे हैं।

मुनिश्री ने कहा कि वास्तव में विवाह का अर्थ क्या होता है, उसका महत्व क्या होता है, वैवाहिक जीवन कैसे जिया जाता है, यह अगर सीखना है तो इसकी प्रेरणा राम-सीता से लेनी चाहिए। आज घर-घर मे इनके वैवाहिक जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग पहुँचाने की आवश्यकता है। आज छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते कमजोर हो जाते हैं। विवाह होने के कुछ दिन बाद ही तलाक जैसी परिस्थितियां बन जाती हैं, विचार नही मिलते हैं। पति-पत्नी एक दूसरे की बात अपने परिवार, मित्र आदि को कहते नजर आते है। इसकी वजह से एक दूसरे पर विश्वास खत्म हो जाता है। दोनों एक-दूसरे को बातें बताने में डरते हैं। कभी-कभी तो यह परिस्थिति बन जाती है कि पति-पत्नी एक दूसरे पर विश्वास करने के बजाए मित्रों आदि पर ज्यादा भरोसा करने लगते हैं। इन सब के कारण व्यक्ति मानसिक रोग से घिर जाता है।

विवाह को भोग का साधन मानने वाले कभी भी वैवाहिक जीवन से खुश नही हो सकते हैं पर जिसने विवाह को धर्म का आधार माना है उसे जीवन में कष्ट आने पर उस कष्ट से लड़ने की शक्ति मिल जाती है। राम ने जब वनवास स्वीकार किया था उस समय सीता को राम ने कहा यहीं पर रहकर मां-पिता की सेवा करना पर सीता ने कहा कि मैंने विवाह के समय वचन देते हुए देव, शास्त्र, गुरु को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा ली थी कि पति का सुख-दुःख दोनों परिस्थिति में साथ नही छोडूंगी तो फिर कैसे महल में रह सकती हूं। वह राम के साथ वन की और चल दी। वन की ओर गई ही नही बल्कि समय पर सहायता भी दी। जब राम ने सीता को लोकापवाद के कारण जंगल में छोड़ने का निर्णय किया और सारथी के साथ तीर्थयात्रा करने के बहाने निकले तो सारथी को कहा कि जंगल में छोड़ देना। सारथी ने जंगल मे पहुंचने के बाद रथ को रोककर सीता को कहा कि रामजी ने आप को जंगल मे छोड़ने को कहा है। मुझे माफ करना मैं तो सेवक हूं। आपको राम को कोई संदेश देना हो तो दे दीजिए। सीता ने कहा कि रामजी से कहना कि जिस लोकापवाद के कारण मुझे छोड़ा है उस लोकापवाद के कारण धर्म को नही छोड़ना।

मुनिश्री ने कहा कि यह है वैवाहिक जीवन का महत्त्व कि इतना सब होने के बाद भी सीता ने राम के लिए मन, वचन, काय से अशुभ बातें नहीं निकाली, यही नहीं धर्म को नहीं छोड़ने का संदेश भी दिया।

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