पाश्चात्य संस्कृति का अंतिम संस्कार करें -अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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हाथरस में लड़की के साथ हूई घटना दुखद है। दिल को दहला देने वाली है। क्या सही है और क्या गलत यह तो ईश्वर ही जाने, पर जैसा सुनने में आ रहा है उससे लगता है कि मनुष्य इतना खौफनाक कैसे हो सकता है? मनुष्य की मानवता बिल्कुल ही मर चुकी है। बिना हैवान बने इस तरह की घटना को अंजाम देना नामुमकिन है। मनुष्य हैवान बन कर इतनी हैवानियत कर रहा है। इन सब का जिम्मेदार कौन है ? हमारे घर,समाज और शिक्षा पद्धति में क्या कमी रह गई कि हम मनुष्य की मानवता भी नही बचा पा रहे हैं। जन्म भले ही मनुष्य पर्याय में हुआ पर काम मनुष्य जैसे नहीं कर रहे हैं। हाथरस जैसा कोई एक केस नही है ऐसे कई मामले है जिनका हमें पता भी नही चलता है। इस तहर की घटनाओं को हम क्या कहें ? कर्म का खेल, पापकर्म का उदय, संस्कारों का अभाव, अध्यात्म की कमी, संस्कार और संस्कृति रहित मनोरंजन के साधनों का प्रसारण, संस्कृत भाषा का ज्ञान नही होना, कोई तो कारण होगा। बिना कारण के ऐसे कार्य होना संभव नही है।
ऊपर हमने जिन कारणों की बात कही वह सब मनुष्य के अंदर धर्म के अभाव में जन्म लेते हैं। हमारे अंदर एक गलतफहमी ने घर कर लिया है कि धर्म का पालन करने से कही मैं संत नही बन जाऊं। आप अपने मन-मस्तिष्क में यह बात फिट कर लेना कि सिर्फ धर्म करने से संत नहीं बन जाते। ऐसा भी नहीं है कि धर्म वही करे जिसे संत बनना है। वास्तविकता तो यह है कि धर्म करने वाला पहले मन -मस्तिष्क से संत बनता है और तभी वह अपने अंदर मानवता को जन्म दे पाता है। उसके बाद कई औऱ दूसरे कारण हैं जिनके कारण वह संत बनता है।
वर्तमान में हम देख रहे हैं कि घर,समाज और शिक्षा पद्धति में कोई ऐसी व्यवस्था नही है जो बच्चों के मन-मस्तिष्क में वासनाओं के प्रति घृणा का भाव पैदा करे। आज घरों में नानी दादी की कहानी सुनाई नहीं देती है और यह एक बड़ा कारण है जिसके चलते हमारी अपनी संस्कृति और संस्कारों में श्रद्धा खत्म होती जा रही है। समाज में पाठशालाओं का संचालन कम होने से सामाजिक और लौकिक शिक्षा के प्रति आदर का भाव पैदा नहीं हो रहा है। शिक्षा पद्धति में संतो महात्माओं के प्रवचन,जीवन परिचय ,भारतीय संस्कृति को समझाने वाली पुस्तकें नही होने से गुणों के प्रति विनय का भाव नही रहा। संस्कृत भाषा का अध्ययन नही होने से हमें अपनी संस्कृति और संस्कार का ज्ञान नही हो पाता। यही वजह है कि आज शुरू से ही मानव के अंदर मानवता के भाव जन्म नहीं ले रहे हैं। आज हमें अपने आप मे लौटने की और पाश्चात्य संस्कृति का अंतिम संस्कार करने की आवश्यकता है। तभी हाथरस जैसी घटनाएं रुक पाएंगी।

अनंत सागर
अंतर्मुखी के दिल की बात
(सत्ताईसवां भाग)
5 अक्टूबर, 2020, सोमवार, लोहारिया
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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