कर्म सिद्धांत में “भाव” का महत्व – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

जीवन में धार्मिक अनुष्ठान का काम जब भी करें तब मन को वहीं लगाए रखें अन्यथा उस काम से आपको पुण्य अथवा सफलता मिलना आशंकित तो हो ही जाएगा और वह धार्मिक अनुष्ठान आपके लिए पाप और दुख का कारण बन जाएगा। कब, कहाँ, कैसे और किस परिस्थिति या आयु में उस कर्म के प्रति आया हमारा मनोभाव उसी अनुरुप हमें पुनर्जन्म की किस जंजाल में बांध लेगा यह पता भी नहीं चलता है। जब जैसी आयु होती है उस समय कर्म के प्रति जैसे मन के विचार होते हैं वैसा ही कर्मबंध होता है और वैसी ही आयु को गति मिलती है। यह कर्म सिद्धांत की विवेचना है। जीवन में आठ बार आयु बंधने का समय आता है । अन्यथा मृत्यु के समय में आयु बंध तो होता ही है बिना आयु बंध किए मृत्यु संभव नहीं है । मनुष्य, देव, नरक और तिर्यंच यह चार आयु के  प्रकार बताए गए हैं । हर जन्म के पश्चात आत्मा योनि अनुसार इन्हीं आयु खण्डों में  परिभ्रमण कर संसार में घूमती रहती है। तो चलिए एक कहानी से आयु कर्म को समझते हैं।
भगवान महावीर स्वामी के समय में  राजगृह नगर का राजा श्रेणिक था। एक दिन राजा श्रेणिक राज सभा में बैठे थे तभी समाचार मिला की नगर के बाहर उद्यान में भगवान महावीर का समवशरण आया है। राजा ने मंत्री को आदेश दिया की उद्यान में भगवान महावीर का समवशरण आया है, तो उनके दर्शन को चलना चाहिए। राजा अपनी सेना और प्रजा के साथ दर्शन करने को निकाला राजा हाथी पर सवार हुआ और हाथों में पूजन की साम्रगी सज्ज थी।जो भी लोग साथ में चल रहे थे वह सब नाच -गा झूम भक्ति के साथ चल रहे थे। जो भी नगर का श्रावक देखता-सुनता तो वह भी राजा के साथ समवशरण में जाने के लिए जुड़ता चलता था। रास्ते में एक तालाब में मेंढक था उसने भी यह सब सुना तो उसका मन भी दर्शन करने को हो गया। अब वह खाली हाथ कैसे जाए … तो उसने अपने मुख में एक कमल के फूल की पंखुडी दबाई और वह भी समवशरण में भगवान महावीर के दर्शन को निकल गया। किन्तु इतनी भीड़ में वह मेंढक राजा श्रेणिक के  हाथी के पैर के नीचेे आ गया और उसकी मृत्यु हो गई। राजा अपनी प्रजा और सेना सहित जब समवशरण में पहुँचा , तब वहाँ पहले से अनेक श्रावक, देव, तिर्यंच इत्यादि मौजूद थे। राजा श्रेणिक ने भगवान को पूजन साम्रगी चढ़ा नमन कर स्तुति की । पर राजा श्रेणिक क्या देखते हैं कि वहां पर अनेक देव थे और सब सुंदर थे पर एक देव के मुकुट में मेंढक का चिन्ह था । राजा श्रेणिक ने गणधर परमेष्ठि से पूछा की, इस देव के मुकुट पर मेंढक का चिन्ह क्यों है?? तब गणधर परमेष्ठि में कहा की यह मेंढक अभी तुम्हारे हाथी के पैर के नीचे आकर मृत्यु को प्राप्त हुआ किंतु शुभ भाव और जिनेंद्र भक्ति के होने से वह अब देव बना है। यह कर्म सिद्धांत से ही संभव हुआ है कि एक मेंढक देव बना। कर्म सिद्धांत का दूसरा पहलू देखिए – जो मेंढक था वह पहले उसी राजगृह नगर में एक सेठ हुआ करता  था साथ ही वह जिनेन्द्र भक्त था। प्रतिदिन भगवान का पूजन और स्तुति किया करता था । एक दिन वह भगवान की भक्ति करते-करते  सामायिक में बैठक गया और एक नियम तय किया की जब तक दीपक जलता रहेगा तब तक सामायिक करता रहूँगा। समय बीतता गया और जैसे जैसे दिपक में घी कम होता सेठ की पत्नी उसमें घी डाल देती। और  समय निकलता गया। अब सेठ को पानी की प्यास लगने लगी गला सूखने लगा। वह सामायिक तो कर रहा था पर अंदर ही अंदर प्यास का भाव होने से व्याकुल हो गया। उसी समय आयु कर्म का बंध हुआ। उसने प्यास बुझाने के भाव को सामायिक से अधिक महत्व दिया था जिसके कारण वह मेंढक की रुप में जन्मा था।

अतः यह कर्म सिद्धांत ही है जो हमें यह बतलाता है कि धर्म करते समय जैसे भाव रखोगे वैसा ही आयु बंध होगा । इसलिए धर्म करते समय भाव  निर्मल रखना बहुत-बहुत आवश्यक है।

अनंत सागर

 कर्म सिद्धांत (तीसरा भाग)

19 मई 2020, उदयपुर

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