परिचय

परिचय एक नजर में

मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का इस धरा पर आगमन 3 जुलाई, 1980 को मध्यप्रदेश के पिपलगोन में हुआ था। उनके लौकिक पिता का नाम श्री सोमचंद जी जैन और माता का नाम विमला देवी है । महाराज श्री 10 वीं कक्षा तक अध्यायवासी रहे और उसके बाद आत्मोत्थान की राह पर निकल पड़े । इस दौरान किशोरावस्था में मात्र 17 साल की उम्र में ही उन्होंने कई राजनीतिक और सामाजिक पदों को सुशोभित किया। मुनि श्री किशोरावस्था में ही इतने प्रज्ञावान और सक्रिय थे कि वह तहसील पत्रकार सलाहकार मंडल, कसरावद के महामंत्री, युवा जन चेतना मंच, जिला खरगोन (उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव द्वारा संचालित) के सदस्य, एन.एस.यू.आई पिपलगोन के नगर अध्यक्ष , वर्धमान बाल मंडल पिपलगोन के उपाध्यक्ष, पोरवाडा नव युवक मंडल के प्रचार- प्रसार मंत्री, जिला पत्रकार संघ के सदस्य भी बने। उन्होंने मित्र मिलन वाचनालय की स्थापना भी छोटी सी उम्र में कर डाली ।

अग्नि और प्रकाश अपने चिह्न जरूर छोड़ते हैं, 17 साल की उम्र में ही उन्होंने अपने स्कूल में शिक्षकों की कमी को लेकर मित्रों के साथ उग्र लेकिन रचनात्मक आन्दोलन किया। स्कूल में शिक्षक सम्मान करवाना, पौधा रोपण जैसे कार्य करने से वे जुनून की हद तक जुड़े । उन्होंने समाधिस्थ आर्यिका श्री वर्धितमति माता जी की प्रेरणा से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से 9 फरवरी 1998 बिजौलिया (राजस्थान) में 3 साल का ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। 22 अप्रेल 1999, अजमेर (राजस्थान) में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद वह 2001 में कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी श्रवणबेलगोला से मिले और उन्हीं की प्रेरणा से क्षुल्लक दीक्षा की ओर कदम बढ़ाया । मुनिश्री को संत सेवा का पहला अवसर वर्ष 2006 के महामस्तकाभिषेक, श्रवणबेलगोला के समय मिला। यहीं उन्होंने रसना इन्द्रिय पर विजय पाई और उन्हें स्वाद से विरक्ति हुई।

यहां उन्हें कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी, श्रवणबेलगोला की बनाई विशेष कमेटी में विशेष स्थान मिला । मुनिश्री ने क्षुल्लक दीक्षा 23 अप्रेल 2008 को डेचा, डूंगरपुर (राजस्थान) में आचार्य श्री अभिनन्दन सागर जी महाराज से कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी, श्रवणबेलगोला की प्रेरणा से धारण की । उन्होंने मुनि दीक्षा एक मई 2015 को भीलूड़ा (राजस्थान) में उपाध्याय श्री अनुभव सागर जी महाराज से धारण की । मुनि श्री कई पुस्तकें लिख चुके हैं और अनेक ग्रंथों का अध्ययन भी उन्होंने किया है। लेखन और अध्ययन का यह सिलसिला निरंतर जारी है। राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में उनके आशीर्वचन नियमित रूप से छपते रहते हैं।

कवरेज

पहले बार मुनि द्वारा न्युज पेपर के लिए कवरेज

फरवरी, 2018 में हुए महामस्तकाभिषेक के अवसर पर श्रवणबेलगोला पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें भी लिखी हैं। राजस्थान पत्रिका में मुिन श्री द्वारा लिखित श्रवणबेलगोला का इतिहास 22 दिन तक लगातार प्रकाशित हुआ। महामस्तकािभषेक का कवरेज भी उन्होंने इसी अखबार के लिए किया। अखबार ने भी उन्हें पूरा सम्मान देते हुए उनके नाम से सारी खबरें छापीं । उनके द्वारा लिए गए श्रवणबेलगोला और भगवान बाहुबली के फोटो भी इसी अखबार में प्रकाशित हुए। संभवत: यह पहली बार था, जब किसी जैन संत ने किसी अखबार के लिए रिपोर्टिंग की हो ।

48 दिन तक कर चुके हैं मौन साधना

किशनगढ़ चातुर्मास 2018 में 48 दिन कि मौन साधना 2 अगस्त,2018 से प्रारम्भ हुई जो 18 सितम्बर 2018 तक चली । सन 2002 में एक घण्डे से मौन साधना कि साधना कि जो बडते बडते सन 2018 में 24 घण्डे तक पहुच गई । मौन साधन के दौरान मात्र 5 घण्डे ही सोते थे । मौन साधना के दौरान रात्रि 2:30 उठते थे और रात्रि 9 बजे सोते थे । बाकी समय जाप,अनुष्ठान,ध्यान और चिंतन में लीन रहते थे । मौन साधना के दौरान अपने चिंतन को शब्दों मे ढालने का कार्य किया । मौन साधना के दौरान प्रतिदिन अलग अलग मंत्रों कि 5322 मंत्रो कि जाप साधना कक्ष में होती थी । मौन साधना में आहार में अन्न का त्याग रहा 58 दिन रहा ।

मुनि श्री के बारे में

ज्योतिष में भी पारंगत हैं मुनि श्री

मुनि श्री पूज्यसागर ज्योतिष विज्ञान में भी अच्छा अनुभव रखते हैं। क्षुल्लक अवस्था में चातुर्मास के दौरान सागवाड़ा और बांसवाड़ा आदि स्थानों पर श्रावकों ने उनके इस अनुभव का लाभ लिया और आज संतोषमय जीवन यापन कर रहे हैं। मुनि श्री का कहना है कि ज्योतिष धर्म का ही एक अंग है। ज्योतिष के बिना जीवन का कार्य सुचारू और व्यवस्थित नहीं हो पाता। कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी और स्वस्तिश्री भट्टारक धवलकीर्ति स्वामी जी के सान्निध्य में उन्होंने ज्योतिष की बारीकियों का ज्ञान प्राप्त किया। वे कहते हैं कि जीवन को सुख, शांति और समृद्धि के साथ व्यतीत करने के लिए चार बातें आवश्यक हैं, 25 प्रतिशत परिवार के संस्कार, 25 प्रतिशत शैशव से युवावस्था में प्राप्त संस्कार, 25 प्रतिशत भाग्य और 25 प्रतिशत पुरुषार्थ। इनका योग ज्योतिष को आधार प्रदान करता है। यह मील का पत्थर है, किन्तु निर्णायक नहीं है। मुनि श्री का मानना है कि ज्योतिष जीवन का मार्गदर्शन करता है, किन्तु पुरुषार्थ व्यक्ति को ही करना होगा। ज्योतिष और साधना का लाभ किशनगढ़ शहर में जैन और अजैन परिवारों को मिला, जिसमें अनेक को लाभ भी प्राप्त हुआ ।

मुनि द्वारा लिखे आलेख

अंत: करण की पवित्रता है धर्म, बेटियां शुभकामनाएं हैं, खुशियों का संसार है मां के कदमों में, अहिंसा परम धर्म और धर्म पवित्र अनुष्ठान है, अहिंसा के पुजारी महावीर, णमोकार मंत्र का महत्व, धर्म की राह पर चलकर बनें परमात्मा, आपदाएं इंसान को मजबूत बनाती हैं, साधना! सकारात्मकता से परिपूर्ण जीवन ऊर्जा है मौन, पर कल्याण का साधन… दान! , जीवन की जीवनी ऊर्जा है आध्यात्म, गुरुकुल शिक्षा पद्धति, दस धर्म और जाप प्रमुख हैं ।

मुनि श्री द्वारा लिखी पुस्तक

समर्पण, सरस्वती आराधना, प्रणाम से प्रारम्भ, एक विचार, चारित्र चक्रवर्ती सार, दशाशन दस, दशलक्षण, श्रवणबेलगोला दर्शन (हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़),आगमेश्वर गोमटेश्वर, श्रवणबेलगोला,सावधान-समाधान

मुनि श्री पर लिखि पुस्तक

आरोहण, दिग्दर्शक चक्रेश, अनुगूंज.

प्रसंग

ऐसी घड़ी पढ़ने की आदत

वर्ष 2003 में मुनि श्री श्रवणबेलगोला गए । उस समय वह ब्रह्मचर्य अवस्था में थे। उन्होंने स्वामी जी से कहा कि आप मुझे पढ़ाएं , तब स्वामी जी बिना कुछ बोले उन्हें भंडार बस्ती ले गए और मंदिर की परिक्रमा लगाने लगे । कुछ समय बाद वह एक जगह रुके और उन्होंने कहा, ‘देखो, आकाश में चिड़िया और उसके बच्चे उड़ रहे हैं। तब तो उनकी समझ में कुछ नहीं आया। तब स्वामी जी ने कहा, ‘चिडिया अपने बच्चे को जन्म तो देती है, भोजन भी लाकर देती, उसे मौसम से बचाती भी है पर उड़ना नहीं सिखाती। वह बच्चा देखते देखते अपने आप उड़ना सीख जाता है। बस मुनि श्री की समझ में आ गया कि स्वामी जी कहना चाहते हैं कि पढ़ना सिखाया नहीं जाता, वह तो गुरु के पास रहकर और उन्हें देख कर ही खुद सीखना होता है । उसके बाद से उन्होंने स्वामी जी कैसे पढ़ते हैं, क्या पढ़ते हैं, इसी को देखकर पढ़ना प्रारम्भ कर दिया।

जगाई शिक्षा की अलख

बचपन से ही शिक्षा के प्रति जागरूक मुनि श्री का मानना था कि शिक्षा ही स्वयं, परिवार और देश को विकास की ओर ले जा सकती है। इसी धारणा की वजह से 17 साल की उम्र में ही अपने स्कूल में शिक्षक और विभाग की कमी को लेकर अपने मित्रों के साथ उग्र आन्दोलन किया। सभी मित्र उनके अन्ना त्याग आन्दोलन में सहयोगी रहे। स्कूल में शिक्षक और विभाग खोलने का आदेश सरकार को देना पड़ा। इस काम में स्पूतनिक के संपादक श्याम अवस्थी और स्थानीय पत्रकारों ने भरपूर सहयोग दिया। स्कूल में शिक्षक सम्मान करवाना, पौधा रोपण करवाना जैसे कार्य करने का जुनून उन्हें बचपन से ही था।

ऐसे हुई स्वाद से विरक्ति

बात है वर्ष 2006 की, श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के बाद स्वामी जी ने मुनिश्री को बुलाकर कहा कि अब से तुम अपने हाथों से भोजन बनाकर खाओगे । मुनि श्री को कुछ बनाना आता ही न था तो दो-तीन दिन तक तो आटे को सेककर ही खाया फिर धीरे-धीर पूड़ी, मूंगफली की चटनी से खाने लगे कभी कभी दाल में ही वाटी डालकर खाते। रोटी तो भारत के नक्शे के समान बनती थी पर उसी को गोल काट कर पकाते और फिर दाल के साथ खाते। धीरे-धीरे सब्जी और मीठा बनाना भी सिख गए । स्वामीजी का यह आदेश उनके लिए वरदान साबित हुआ भोजन के प्रति, स्वयं के प्रति आसक्ति ही चली गई दो वर्ष तक स्वामी जी ने मीठे का त्याग करवा दिया। यह सब तब वहुत काम आया,जब मुनि श्री की क्षुल्लक दीक्षा हुई।

जिद से बने संन्यासी

मुनि श्री बहुत जिद्दी प्रवृत्ति के थे और यही उनके संन्यास लेने का कारण बनी। बात फरवरी, 1998 की है। ब्रह्मचारी विजय भाई और राजू भाई की दीक्षा होने से पहले गांव पिपलगोन में उनकी गोद भराई का कार्यक्रम था। उसके बाद उन्हें सनावद छोड़ने जाना था, मुनि श्री भी चले गए। सनावद गोद भराई कार्यक्रम होने के बाद दोनों भाई इन्दौर गए साथ में भी गया यहा कार्यक्रम होने के बाद दोनों भाई गलत गाड़ी बताकर खुद बिजोलिया चल गए। अब यह मुनि श्री की जिद थी कि क्या इनके बिना नहीं जा सकते बिजौलिया। उसी दिन वह कोटा पहुंच गए। वहां से बिजोलिया जाने के लिए टिकट लेने की लाइन में लगे तो उनके आगे ही दोनों भाई भी थे। कोटा से सभी साथ बिजोलिया पहुंच गए। वहांपर आचार्य श्री के दर्शन किए, वहीं वह मां आर्यिका श्री वर्धितमति माता जी से मिले और उन्हीं के कहने पर मुनि श्री ने तीन साल का ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया।

मुनि श्री के मार्गदर्शक गुरु

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आचार्य श्री अभिनन्दन सागर महाराज

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आचार्य श्री वर्धमान सागर महारज

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आर्यिका वर्धित मति माता जी

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कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी ,श्रवणबेलगोला

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आचार्य श्री अनुभव सागर महारज

मुनि श्री पूज्य महाराज द्वारा चला जा रहें अभियान

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