शांति कथा

भाग पचास : जितना चाहे करो धर्म का पालन, लेकिन करो अच्छी तरह से-आचार्य शांतिसागर महाराज

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 आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि आज के युग में सभी कहते हैं कि धर्म का पालन कठिन है,…

भाग उन्चास : जैन धर्म में नहीं है निरपराधी जीव की हिंसा – आचार्य शांतिसागर महाराज

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आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि हिंसा करना महापाप है। धर्म का प्राण और जीवन-सर्वस्व अहिंसा धर्म ही है। सत्ता…

भाग अडतालीस : जिनेंद्र भगवान की वाणी में विश्वास न होने से ही मिलती है विफलता-आचार्य शांतिसागर महाराज

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 आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि धर्म का रक्षण करो तो वह भी आपकी रक्षा करेगा। इस धर्म का…

भाग सैंतालीस : व्रती जीव ही देवगति में जाता है, इसलिए करें पापों का त्याग-आचार्य शांतिसागर महाराज

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 आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि जिन भगवान की वाणी के सिवाय अन्यत्र कहीं भी कल्याण नहीं है। जिनेंद्र…

भाग छियालीस : अपनी प्रशंसा सुनकर राई के बराबर भी आनंद नहीं मिलता था आचार्य शांतिसागर महाराज को

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 एक बार फलटण में हीरक जयंती के समारंभ में अनेक धनकुबेरों का आगमन हुआ। उस समय आचार्य श्री शांतिसागर…

भाग पैंतालीस : आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की हर चेष्टा प्रदान करती थी संयम की प्रेरणा

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 एक बार कुंथलगिरि में आचार्य शांतिसागर महाराज के छोटे भाई कुमगौंडा पाटील के चिरंजीव श्री जनगौंडा पाटील जयसिंहपुर से…

भाग चवालीस : शरीर के प्रति निस्पृह भावना के कारण नहीं रहती दिगंबर साधुओं में वस्त्रधारण की मनोवृत्ति-आचार्य शांतिसागर महाराज

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 एक बार आचार्य शांतिसागर महाराज ससंघ रायपुर पहुंचे तो वहां एक अंग्रेज अधिकारी की मेम ने दिगंबर संघ को…

भाग तैंतालीस : आचार्य शांतिसागर हर उपसर्ग को ऐसे सहन करते थे, जैसे यह शरीर ही उनका नहीं

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 एक बार आचार्य शांतिसागर महाराज दमोह पहुंचे। आचार्य श्री को वहां कष्ट न हो, इसलिए एक सेठजी ने घर…

भाग बयालीस : केशलोंच आत्मविकास का कारण, इससे होती है जिनधर्म की प्रभावना-आचार्य शांतिसागर महाराज

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एक बार आचार्य शांतिसागर महाराज से किसी ने पूछा कि क्या केशों को उखाड़ने में आपको कष्ट नहीं होता, हमने तो…

भाग इकतालीस : सात व्यसनों और पांच पापों को छोड़कर राजा को करना चाहिए शासन-आचार्य शांतिसागर महाराज

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एक बार सांगली राज्य के अधिपति श्रीमंत राजा साहब आचार्य शांतिसागर महाराज के दर्शन के लिए आए। आचार्य श्री ने…
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