भाग सैंतालीस : व्रती जीव ही देवगति में जाता है, इसलिए करें पापों का त्याग-आचार्य शांतिसागर महाराज

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आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि जिन भगवान की वाणी के सिवाय अन्यत्र कहीं भी कल्याण नहीं है। जिनेंद्र भगवान की वाणी पूर्णतया सत्य है। वह कहते थे कि जगह-जगह जिनेंद्र भगवान के मंदिर बनने चाहिए क्योंकि अगर जिनेंद्र भगवान का मंदिर नहीं होगा तो श्रावकों का धर्म भी नहीं रहेगा और श्रावकों के अभाव में मुनिधर्म कैसे रहेगा और मुनिधर्म जब तक रहेगा, तब तक जिनधर्म रहेगा। इसीलिए धर्म के आधारस्तंभ की पवित्रता के रक्षण के लिए हमें हर वक्त प्रयत्न करना पड़ेगा। यदि भगवान का स्थान नहीं रहा तो हम भी नहीं रहेंगे। हमें भगवान की आज्ञा माननी चाहिए। आचार्य शांतिसागर महाराज का कहना था कि भगवान की वाणी में लिखा है कि अभी जिनधर्म का लोप नहीं होगा। जो लोग अज्ञान के अंधकार में चलते हैं, उन्हें शास्त्र अजीव होते हुए भी मोक्ष का मार्ग बताता है। आचार्य शांतिसागर महाराज के अनुसार, शास्त्र में लिखा है कि जीव को पंचपापों का त्याग करना चाहिए। इस पापत्याग से यह जीव हीन गतियों में नहीं जाता। व्रती जीव ही देवगति में जाता है, इसलिए पापों का त्याग करना चाहिए।

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