भाग पैंतालीस : आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की हर चेष्टा प्रदान करती थी संयम की प्रेरणा

label_importantशांति कथा

एक बार कुंथलगिरि में आचार्य शांतिसागर महाराज के छोटे भाई कुमगौंडा पाटील के चिरंजीव श्री जनगौंडा पाटील जयसिंहपुर से सपरिवार आए। बचपन में जनगौंडा आचार्य श्री की गोद में खूब खेल चुके थे लेकिन तब स्नेह दूसरे प्रकार का था और अब स्नेह वीतरागिता की ओर ले जाने वाले था। आचार्य श्री ने जनगौंडा से कहा कि उन्होंने यम समाधि ली है और अब तुम्हें भी संयम धारण करना चाहिए। इसके लिए तुम दिगंबर दीक्षा धारण करो। इस पर जनगौंडा ने कहा कि मैं कुछ वर्षों की साधना के पश्चात मुनि बनने की प्रतिज्ञा करता हूं। इसके बाद आचार्य श्री ने जनगौंडा की पत्नी लक्ष्मीदेवी को बुलाया और पूछा कि जनगौंडा के मुनि बनने से उसे तो कोई आपत्ति नहीं है। इस वह लक्ष्मीदेवी ने कहा कि उसे कोई आपत्ति नहीं है। महाराज ने इस पर लक्ष्मीदेवी को भी व्रत प्रतिमा दी। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी व्रती श्रावक बन गए। आचार्य श्री ने जनगौंडा से यह भी कहा कि जब तुम मुनि बन जाओ तो अपने पुत्र को भी आगे मुनि पद धारण करने को कहना न भूलना। अपने घराने में मुनि पद धारण करने की परंपरा चलती जाए, इस बात का ध्यान रखना। देखा जाए तो आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की हर चेष्टा संयम की प्रेरणा प्रदान करती थी।

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