तीर्थंकर की वाणी कर्म निर्जरा का कारण -अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

तीर्थंकर की वाणी कर्म निर्जरा का कारण -अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज तीर्थंकर की वाणी को सहजता से समझने के लिए उसे चार भागों में

करणानुयोग पापों से बचाने में सहायक- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

करणानुयोग पापों से बचाने में सहायक- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज जैन शास्त्रों को समझने की दृष्टि से चार भागों में विभाजित किया गया है

आचरण से ही व्यक्ति की पहचान-अंतर्ज्ञानी मुनि पूज्य सागर महाराज

आचरण से ही व्यक्ति की पहचान-अंतर्ज्ञानी मुनि पूज्य सागर महाराज आचरण के बिना सब व्यर्थ है । व्यक्ति की पहचान उसके आचरण से होती ।

शरीर अजीव, आत्मा जीव- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

शरीर अजीव, आत्मा जीव- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज जिस शरीर के साथ जन्म हुआ है, वह वास्तव में हमारा नहीं है। वहीं दुख और

संसार में दुखों का अंत नहीं- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

संसार में दुखों का अंत नहीं- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज संसार में दुखों का कोई अंत नहीं है। दुखों का अंत तो मुक्त होने

आचरण की पवित्रता से ही सम्यक चारित्र की प्राप्ति – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

आचरण की पवित्रता से ही सम्यक चारित्र की प्राप्ति – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज अपने आप को पांच पापों से बचाने का नाम ही

राग द्वेष से संयम खो देता है जीव- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

राग द्वेष से संयम खो देता है जीव- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज जीव राग-द्वेष के कारण अपना संयम खो देता है। उसे सही- गलत

धर्म के निमित्त हुई हिंसा दुख का कारण नहीं-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

धर्म के निमित्त हुई हिंसा दुख का कारण नहीं-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज धर्म का रथ दो पहियों से चलता है। पहला पहिया श्रावक का

जिसका जीवन व्यवस्थित वही सफल- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

जिसका जीवन व्यवस्थित वही सफल- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज जिसका जीवन व्यवस्थित हो वही मनुष्य जीवन में सफलता को प्राप्त करता हुआ परमात्मा पद

गृहस्थ के लिए अणुव्रत की पालना- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

गृहस्थ के लिए अणुव्रत की पालना- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज गृहस्थ के आचरण को मर्यादित करने के 12 प्रकार के व्रतों का वर्णन पहले