भाग उन्चास : जैन धर्म में नहीं है निरपराधी जीव की हिंसा – आचार्य शांतिसागर महाराज

भाग उन्चास : जैन धर्म में नहीं है निरपराधी जीव की हिंसा – आचार्य शांतिसागर महाराज आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि हिंसा करना महापाप

भाग सैंतालीस : व्रती जीव ही देवगति में जाता है, इसलिए करें पापों का त्याग-आचार्य शांतिसागर महाराज

भाग सैंतालीस : व्रती जीव ही देवगति में जाता है, इसलिए करें पापों का त्याग-आचार्य शांतिसागर महाराज आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि जिन भगवान

भाग पचास : जितना चाहे करो धर्म का पालन, लेकिन करो अच्छी तरह से-आचार्य शांतिसागर महाराज

आचार्य शांतिसागर महाराज कहते थे कि आज के युग में सभी कहते हैं कि धर्म का पालन कठिन है, इसे निभाने में बड़ी तकलीफों और

शांति कथा – भाग अडतालीस : जिनेंद्र भगवान की वाणी में विश्वास न होने से ही मिलती है विफलता-आचार्य शांतिसागर महाराज

शांति कथा – भाग अडतालीस : जिनेंद्र भगवान की वाणी में विश्वास न होने से ही मिलती है विफलता-आचार्य शांतिसागर महाराज आचार्य शांतिसागर महाराज कहते

शांति कथा – भाग अठारह : सहभोजन आदि से आत्मा का उत्थान मानना भ्रम मानते थे आचार्य शांतिसागर जी – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

शांति कथा – भाग अठारह : सहभोजन आदि से आत्मा का उत्थान मानना भ्रम मानते थे आचार्य शांतिसागर जी – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

शांति कथा – भाग सोलह : दूसरों की अंतर्वेदना दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

शांति कथा – भाग सोलह : दूसरों की अंतर्वेदना दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज सातगौड़ा

स्वाध्याय – 13 : सात प्रकार के केवली

स्वाध्याय – 13 : सात प्रकार के केवली 1 तीर्थंकर केवली : 2,3 एवं 5 कल्याणक वाले केवली । 2 सामान्य केवली : कल्याणकों से रहित केवली

स्वाध्याय – 14 : ज्ञानाराधना के आठ दोष

स्वाध्याय – 14 : ज्ञानाराधना के आठ दोष 1.स्वाध्याय के समय का ध्यान न रखना पहला दोष है । 2.शुद्ध उच्चारण न करना,अक्षरादिक को छोड़

स्वाध्याय – 15 : सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बाह्य कारण

स्वाध्याय – 15 : सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बाह्य कारण नरकगति में – जाति स्मरण, धर्मश्रवण ,वेदना अनुभव (तीसरी पृथ्वी तक) और उसके बाद चौथी पृथ्वी

स्वाध्याय-17 : स्वाध्याय के पांच भेद

स्वाध्याय-17 : स्वाध्याय के पांच भेद • आलस्य का त्यागकर ज्ञान की आराधना करना निश्चय स्वाध्याय है। • व्यवहार में स्वाध्याय के पांच भेद हैं