स्वाध्याय – 19 : आहार दान ऐसे करना चाहिए

स्वाध्याय – 19 : आहार दान ऐसे करना चाहिए नवपुण्यैः प्रतिपत्तिः सप्तगुण समाहितेन शुद्धेन । अपसूनारम्भाणा मार्याणामिषयते दानम् ।। 113।। (रत्नकरण श्रावकाचार) पाँचसूनरूप पापकार्यों से

स्वाध्याय – 18 : तीर्थंकर विशेष

स्वाध्याय – 18 : तीर्थंकर विशेष • कलश : तीर्थंकर भगवान के जन्म अभिषेक के कलश का मुख एक योजन (12 किलोमीटर), उदर में चार योजन और

स्वाध्याय : 20 – शरीर विशेष

स्वाध्याय : 20 – शरीर विशेष शरीर के पांच भेद है । 1. औदारिक शरीर 2. वैक्रियिक शरीर 3. आहारक शरीर 4. तेजस शरीर 5.

स्वाध्याय : 22 दर्शन,ज्ञान और चारित्र के पहले सम्यक् विशेषण क्यों लगता है ।

स्वाध्याय : 22 दर्शन,ज्ञान और चारित्र के पहले सम्यक् विशेषण क्यों लगता है । आप सब देखते है कि दर्शन, ज्ञान और चारित्र के पहले

स्वाध्याय : 23 सम्यग्दर्शन विशेष – 1

स्वाध्याय : 23 सम्यग्दर्शन विशेष – 1 सम्यग्दर्शन के कई भेद अलग-अलग शास्त्रों में बताए हैं। भेदों के नाम अलग-अलग है पर सब का अर्थ,भाव

स्वाध्याय : 24 सम्यकदर्शन विशेष-2

स्वाध्याय : 24 सम्यकदर्शन विशेष-2 राजवार्तिक और यशस्तिलक चम्पूगत में दस प्रकार का सम्यकदर्शन भी होता है ।  तो आओ जानते हैं । आज्ञा सम्यकदर्शन – वीतराग

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 3

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 3 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 3 सर्वसिद्धिदायक बुद्धया विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ, स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोहम् । बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्यःक इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 6

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 6 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 6 विद्या प्रदायक अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान् माम् । यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 12

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 12 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 12 हस्तिमद –निवारक यैः शान्त – राग – रुचिभिः परमाणुभिस् – त्वम् , निर्मापितस् – त्रिभुवनैक

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 17

भक्तामर स्तोत्र काव्य – 17 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 17 सर्व उदर पीडा नाशक नास्तं कदाचि – दुपयासि न राहु-गम्यः, स्पष्टी-करोषि सहसा युगपज् जगन्ति ।