भक्तामर स्तोत्र काव्य – 25
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 25 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 25 नज़र (दृष्टि देष) नाशक बुद्धस् त्व मेव – विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, त्त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्कर –त्वात्
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 26
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 26 आधा शीशी (सिर दर्द) एवं प्रसूति पीडा नाशक तुभ्यं नमस् -त्रिभुव नार्ति -हाराय नाथ, तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल-भूषणाय । तुभ्यं
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 27
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 27 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 27 शत्रुकृत-हानि निरोधक को विस्मयोत्र यदि नाम गुणै- रशेषैस्, त्वं संश्रितो निरवकाश-तया मुनीश । दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वैः,
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 28
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 28 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 28 सर्व कार्य सिद्धि दायक उच्चै- रशोक-तरु-संश्रित-मुन्मयूख- माभाति रूप-ममलं भवतो नितांतम् । स्पष्टोल् लसत्-किरण – मस्त-तमोवितानम्,
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 30
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 30 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 30 शत्रु स्तम्भक कुन्दाव- दात-चल-चामर-चारु-शोभं, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कांतम् । उद्यच् छशाङ्क -शुचि-निर्झर-वारि-धार- मुच्चैस्तटं सुरगिरे –
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 32
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 32 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 32 संग्रहणी आदि उदर पीडा नाशक गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्वभागस्- त्रैलोक्य-लोक-शुभ-सङ्गम-भूति-दक्षः । सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषकः सन्, खे दुन्दुभिर्-ध्वनति ते यशसः प्रवादि
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 33
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 33 सर्व ज्वर नाशक मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात संतानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि रुद्धा । गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता, दिव्या दिवः पतति ते वचसां ततिर्- वा॥33॥ अन्वयार्थ : गन्धोदबिन्दु – सुगन्धित
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 34
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 34 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 34 गर्व रक्षक शुम्भत् प्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते, लोक-त्रये द्युति मतां द्युति -माक्षिपंती । प्रोद्यद् दिवाकर्-निरंतर-भूरि-संख्या, दीप्त्या जयत्यपि
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 35
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 35 काव्य – 35 दुर्भिक्ष चोरी मिरगी आदि निवारक स्वर्गा-पवर्ग-गम मार्ग-विमार्ग -णेष्टः, सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्याः । दिव्य-ध्वनिर्-भवति ते विशदार्थ-सर्व- भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः ॥35॥ अन्वयार्थ
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 36
भक्तामर स्तोत्र काव्य – 36 भक्तामर स्तोत्र काव्य – 36 सम्पत्ति-दायक उन्निद्र-हेम-नव पङ्कज पुञ्ज -कांती, पर्युल्- लसन् – नख -मयूख-शिखाभि-रामौ । पादौ पदानि तव यत्र
