भाग अठारह : सहभोजन आदि से आत्मा का उत्थान मानना भ्रम मानते थे आचार्य शांतिसागर जी – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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आचार्य शांतिसागर जी का शरीर जिस तरह से दिगंबर था, उस पर कोई आवरण नहीं था, उसी प्रकार से उनकी प्रवृत्ति, उपदेश में भी पाखंड, दंभ या प्रदर्शन नहीं था। उनके कार्यों में घृणा, दुर्भाव की कल्पना अज्ञान की बात है । शेडवाल का धर्मपरायण हरिजन अब स्वर्गवासी हो चुका है लेकिन उसका कथन आज भी प्रकाश देता है। वह कहता था, शांतिसागर महाराज ने मेरा सच्चा उद्धार किया । मेरी आत्मा उन्हीं की वजह से आज बहुत सुखी है। गुरु महाराज ने व्रत देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है, यह उपकार मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा । मेरी जरा भी लालसा नहीं है कि मैं बड़े लोगों के साथ बैठकर भोजन करूं या फिर वे मेरे साथ भोजन करें। उससे आत्मा का क्या उद्धार होगा । दरअसल आचार्य श्री ने उसे समझाया था कि सहभोजन आदि से आत्मा का उत्थान मानना भ्रम है। वह कहते थे कि भोग और विषय के सेवन से जो आत्मा का उद्धार मानते हैं, वे जीव नरक-निगोद में अनंत काल तक कष्ट पाया करते हैं ।

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