भक्तामर स्तोत्र काव्य – 31

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 31

राज्य सम्मान दायक व चर्म रोग नाशक

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क-कांत-
मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम् ।
मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभम्,
प्रख्याप -यत्-त्रिजगतः परमेश्वर – त्वम् ॥31॥

अन्वयार्थ : उच्चै:स्थितम् -ऊपर स्थित । शशाङ्ककान्तम् -चन्द्र के समान कान्तिवाले । स्थगित – रोका है । भानुकर-सूर्य के । प्रतापम् – प्रताप को जिन्होंने ऐसे,तथा । मुक्ताफल – मोतियों के । प्रकरजाल – समूह वाली झालर से । विवृद्धशोभम् -बढ़ रही है शोभा जिसकी,ऐसे । छत्रत्रयम् – तीन छत्र । तव – आपके । त्रिजगत:-तीन जगत की । परमेश्वरत्वम् – परमेश्वरता को । प्रख्यातपयत् – प्रकट करते हुए । विभाति – शोभायमान हो रहे हैं ।

अर्थ- चन्द्रमा के समान सुन्दर,सूर्य की किरणों के संताप को रोकने वाले,तथा मोतियों के समूहों से बढती हुई शोभा को धारण करने वाले, आपके ऊपर स्थित तीन छत्र ,मानो आपके तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं ।

जाप – ऊँ उवसग्गहरं पासं वन्दामि कम्म घण मुक्कं विसहर विसणिण्णासं ( विसणिर्णासिणं) मंगल कल्लाण आवासं ऊँ ह्रीं नमः स्वाहा ।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो घोर परक्कामाणं झ्रौं झ्रौं नमः स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं छत्रत्रय प्रातिहार्य युक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं छत्रत्रय प्रातिहार्य युक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – लाल कपडॆ ,लाल माला,लाल आसन पर बैठकर पूर्व दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

और आगे

आचार्य मानतुंग स्वामी पर जब उपसर्ग हुआ था तो उन्होंने कभी पीछे मुडक़र उन उपसर्गों के बारे में चिंता नहीं की। बस आगे बढ़ते रहे। इसी तरह से एक लकड़हारा था। वह हर रोज जंगल जाता, लकड़ी काटता और वहां तपस्या में लीन एक मुनि को प्रणाम करके आ जाता। वह कुछ नहीं मांगता और चुपचाप चला जाता। एक दिन उन मुनि श्री ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे भक्तामर स्तोत्र का 31वां श्लोक सुनाया और कहा कि आगे जा। लकड़हारे ने सोचा कि मुनि श्री उसे जंगल में आगे बढऩे के लिए कह रहे हैं। आगे जाने पर उसे चंदन के पेड़ मिले। लकड़हारे ने सोचा कि अगर वह पहले ही आगे जाता तो आज कितना अमीर होता। उसने चंदन की लकडिय़ां काटीं और उनको बाजार में बेच दीं। उसकी सारी दरिद्रता दूर हो गई। अगले दिन वह फिर जंगल पहुंचा तो और आगे बढ़ा तो चांदी की खानें थी। अगले दिन उसे सोने की खानें मिलीं। वह फूट-फूट कर रोया कि आज तक आगे क्यों नहीं बढ़ा। अगले दिन गया तो आगे बढऩे पर उसे हीरे की खदानें मिलीं। वह भौंचक्का रह गया। तभी उसने सोचा कि चारों ओर इतने हीरे चमक रहे हैं लेकिन उससे अधिक मूल्यवान हीरे तो उसके भीतर है। मैं क्यों इन नश्वर चीजों के पीछे भाग रहा हूं। उसने उसी वक्त सब कुछ त्याग दिया और वहीं तपस्या करने बैठ गया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 31वें श्लोक का पाठ व्यक्ति के सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और वह धर्म मार्ग पर बढ़ जाता है।

चित्र विवरण – चन्द्रमा के समान सुन्दर रत्नमय तीन छत्र भगवान के सिर पर तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं ।

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