भक्तामर स्तोत्र काव्य – 36

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 36

सम्पत्ति-दायक

उन्निद्र-हेम-नव पङ्कज पुञ्ज -कांती,
पर्युल्- लसन् – नख -मयूख-शिखाभि-रामौ ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्तः,
पद्मानि तत्र विबुधाः परि-कल्पयंति ॥36॥

अन्वयार्थ : जिनेन्द्र – हे जिनेन्द्र !। उन्निद्र – खिले हुए । हेम -स्वर्ण के । नव – नवीन । पंकज – कमलों के । पुञ्ज – समूह के समान । कान्ती – कान्ति वाले । पर्युल्लसन् – सर्व और फैलने वाली । नखमयूख – नखों की किरणों की । शिखाभिरामौ – प्रभा से सुन्दर । तव – आपके । पादौ- चरण । यत्र – जहाँ पर । पदानि – पद । धत्तः- रखते हैं । तत्र – वहाँ पर । विबुधा – देवगण । पद्मानि – कमलों की । परिकल्पयन्ति – रचना करते ।

अर्थ- पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण जहाँ पडते हैं वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं ।

जाप – ऊँ ह्रीं श्रीं कलिकुण्ड दण्ड स्वामिन् आगच्छ आगच्छ आत्मंत्रान् आकर्षय आकर्षय आत्ममंत्रान् रक्ष रक्ष परमंत्रान् छिन्द छिन्द मम समीहितं कुरु कुरु नम: स्वाहा ।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो विप्पोसहि( विट्ठोसहित्ताणं ) पत्ताणं झ्रौं झ्रौं नम: स्वाहा ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं पादन्यासे पद्मश्री युक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं पादन्यासे पद्मश्रीयुक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – पीले कपडॆ ,पीली माला,पीला आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

राजकुमारी बनी आर्यिका

एक नगर की राजकुमारी को अपने रूप पर बहुत घमंड था। एक दिन वह अपने महल के झरोखे में बैठी थी तो उसने नीच एक दिगंबर साधु को देखा। राजकुमारी उस समय पान खा रही थी। उसने पान की पीक साधु पर थूक दी। मुनि श्री ने उसे कुछ न कहा और आगे बढ़ गए क्योंकि वह इन सब चीजों से ऊपर उठ चुके थे। लेकिन राजकुमारी को अपनी नीचता का फल तुरंत मिल गया। वह रोगी और कुरुपा हो गई। सब उसे देखकर नाक-भौंह सिकोडऩे लगे। तब राजा ने परेशान होकर पास के जंगल में तपस्या कर रहे एक वीतरागी जैन मुनि की मदद ली। मुनिराज ने राजा को भक्तामर के 36वें श्लोक से अभिमंत्रित करके जल का एक लोटा देकर कहा कि इसे जलाशय डाल दो और 36 दिन तक राजकुमारी को स्नान कराओ। लेकिन इतना याद रखना कि राजकुमारी ठीक हो जाए तो उससे पूछ लेना कि क्या वह जैन धर्म की दीक्षा लेना चाहती है। अगर वह हां करे तो उसे दीक्षा दिलवा कर आर्यिका बना देना। राजा ने ऐसा किया। राजकुमारी ठीक हो गई और जैन धर्म की शरण में जा कर आर्यिका बन गई।

शिक्षा : इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि भक्तामर के 36वें श्लोक का पाठ करने से घमंडी से घमंडी भी अहंकार छोडक़र धर्म की शरण में आ जाता है।

चित्र विवरण- जहाँ जहाँ भगवान के चरण पडते हैं ,वहीं देवगण सत्ताईस स्वर्णमय दिव्य कमलों की रचना कर रहे हैं फिर भी चलते समय भगवान के चरणों से उन कमलों का स्पर्श भी नहीं हो रहा हैं ।

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