भक्तामर स्तोत्र काव्य – 45

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भक्तामर स्तोत्र

काव्य – 45

सर्व भयानक रोग नाशक

उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः ।
त्वत्पाद-पङ्कज-रजोऽमृत दिग्ध-देहाः,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्य-रूपाः ॥45॥

अन्वयार्थ: उद्भूत – उत्पन्न हुए । भीषण – भयानक । जलोदर – जलोदर के । भारभुग्नाः- भार से पीड़ित । शोच्यां – शोचनीय । दशाम् – दशा को । उपगताः- प्राप्त, तथा । च्युतजीविताशाः – छोड़ दी है जीने की आशा जिन्होंने । मर्त्या – ऐसे भी मनुष्य । त्वत्पादपङ्कज – आपके चरण कमलों की । रजोऽमृत – रजरूपी अमृत से । दिग्ध देहा:- देह को लिप्त करके । मकरध्वज – कामदेव के । तुल्यरूपा – समान रूप वाले । भवन्ति – हो जाते हैं ।

अर्थ- उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए,शोचनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं रही है जीवन की आशा जिनके,ऎसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अमृत से लिप्त शरीर होटल हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं ।

जाप – ॐ नमो भगवति क्षुद्रोपद्रव शांतिकारिणि रोग कुष्ठ-ज्वरोपशमनं शांति कुरु कुरु स्वाहा।

ऋद्धि मंत्र – ऊँ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण महाणसाणं झ्रौं झ्रौं नम: ।

अर्घ्य – ऊँ ह्रीं दाहताप जलोदराष्ट सन्निपातादि रोगहराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मंत्र – ऊँ ह्रीं दाहताप जलोदराष्ट सन्निपातादि रोगहराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय हृदयस्थिताय श्रीवृषभ जिनेन्द्राय दीपं समर्पयामि स्वाहा ।

जाप विधि – पीले कपडॆ ,पीली माला,पीला आसन पर बैठकर पूर्व (दक्षणि) दिक्षा की और मुख कर जाप करना चाहिए ।

कहानी

सुकर्म की जीत

एक बार की बात है, नागपुर के राजा मानगिरि अपनी सेना के साथ जंगल में भ्रमण को निकले। तभी उन्हें रास्ते में दुर्बल और बीमार युवक दिखाई दिया। उन्होंने उस युवक से पूछा कि वह यहां क्यों पड़ा हुआ है, तब युवक ने कहा कि वह पड़ोसी उज्जयिनी के राजा नृपशेखर का बेटा हंसराज हूँ । लेकिन मुझे बहुत सी बीमारियां हो गई हैं। कोढ़ भी हो गया है और भी बहुत सारी बीमारी है बस मुझे तो मौत का इंतजार है क्योंकि रोग ठीक ही नहीं हो रहा है । राजा उसे अपने साथ ले गए और महल में लेकर जाकर अपनी बेटी का विवाह उससे कराने के लिए मंडप तैयार करा दिया। सभी बोले कि महाराज ऐसा अनर्थ न करो। तब राजा ने कहा कि यह मेरी बेटी बड़ा कर्म-कर्म चिल्लाती है। यह नहीं मानती कि मैंने ही इसे सब कुछ दिया है। अब देखें कि इस युवक से विवाह के बाद इसका क्या होता है। राजा की बेटी ने चुपचाप उस युवक से विवाह कर लिया। जैसे ही वह महल से बाहर निकली, उसे एक दिगंबर मुनिराज मिले और उन्होंने उसे भक्तामर के 45वें श्लोक का पाठ मन लगाकर करने का कहा। सात दिन तक अखंड जाप करने के बाद युवक की सारी बीमारियां चली गईं और उसके पिता ने उसे उस देश का राजकुमार बना दिया।

शिक्षा- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्तामर स्तोत्र के 45वें श्लोक का पाठ श्रद्धापूर्वक करने से अशुभ कर्मों का जाल कट जाता है और व्यक्ति का उद्धार हो जाता है क्योंकि बुरे कर्मों का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है।

चित्र विवरण- जलोदर रोग से ग्रसित व्यक्ति जीवन से निराश होकर वैद्य के निकट बैठा है,परिजन भी दु:खी हैं । भक्त निराश होकर भगवान की चरण रज उदर में लगा रहा है और रोगमुक्त होकर शांति का अहसास कर रहा है ।

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