छहढाला पहली ढाल छंद 17

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छहढाला

पहली ढाल

देवगति में वैमानिक देवों के दु:ख

जो विमानवासी हू थाय, सम्यग्दर्शन बिन दु:ख पाय।
तहँ ते चय थावर-तन धरै, यों परिवर्तन पूरे करै।।17।।

अर्थ – कभी यह जीव स्वर्ग में विमानवासी देव भी हुआ, तो भी उसने वहाँ सम्यग्दर्शन के अभाव में दु:ख ही पाया। आयु पूर्ण होने पर देवगति से चयकर वह तिर्यंचगति में स्थावर के शरीर को धारण करने के दु:खरूप कुगतिभ्रमण करता है। इस प्रकार यह जीव संसार में पंचपरिवर्तनों को पूरा करता है।

विशेषार्थ – विमानों में रहने वाले अथवा स्वर्ग एवं ग्रैवेयक आदि में रहने वाले देव वैमानिक कहलाते हैं। स्थावर नामकर्म के उदय से युक्त जीव स्थावर कहलाते हैं। चय शब्द का अर्थ मरण ही है, किन्तु सौधर्मादि विमानवासियों की गति उत्तम है अतएव वहाँ से निकलने को ‘चय या च्युत’ होना, इस शब्द का प्रयोग होता है। नरकगति एवं भवनत्रिक ये गतियाँ हीन हैं, अतएव इनसे निकलने को ‘उद्वर्तन’ (उद्धार) तथा तिर्यंच और मनुष्य गति सामान्य है अत: उनसे निकलने को ‘काल करना’ इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावरूप संसार चक्र में परिभ्रमण करना परिवर्तन कहलाता है।

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