दया के बिना धर्म नहीं है

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daya ke bina dharm nahi hai

भीलूड़ा (राजस्थान) ।
मुनि श्री पूज्य सागरजी महाराज ने मंगलवार को श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए कहा कि जीवन में कितनी भी सुख सुविधा मिल जाए, लेकिन उसके साथ ही पाप कर्म का उदय है,तो सुख साधन खत्म हो जाते है और यदि जीवन में कोई सुख सुविधा, नहीं सिर्फ पुण्य कर्म हो तो सुख सुविधा अपने आप आ जाते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि कभी किसी से वैर भाव मत रखना। वैर रखने से मानव रोगी बन जाता है। मन में हमेशा दया का भाव रखना। याद रखना कि दया के बिना धर्म नहीं होता है। घर में झाडू भी लगाना तो यह ध्यान रखना कि जीव जंतू ना मरें। दया का भाव, करूणा का भाव, प्रेम का भाव लाने के लिए उस राजकुमारी अंगशारा को याद कर लेना जिसे अजगर निगलने वाला था, लेकिन उसने अजगर के प्रति भी दया भाव रखा और उसे किसी को मारने नहीं दिया। उसकी दया का प्रभाव ऐसा था कि उसके शरीर के छूए हुए जल से लक्ष्मण की मूर्छा टूट गई थी। मुनि श्री ने कहा कि अपने आप को इतना दयावान बनाओ कि तुमको छूने वाले के रोग दूर हो जाएं। भिखारी घर आया और आपने उसे खाना खिला दिया। तो यह दया है कि, लेकिन सोचा कि इस खिलाने के बदले दो काम करा लूंगा तो यह दया नहीं लालच है। ऐसी दया नहीं रखनी है। यदि हम दया के बदले फल चाहते हैं तो ऐसी दया, करूणा, ऐसा वात्साल्य काम का नहीं है। दया करो तो निस्वार्थ करो। स्वार्थ के कारण की गई दया पाप का कारण बन सकती है। दया के पीछे कोई स्वार्थ नहीं होना चाहिए। स्वार्थहीन दया ना सिर्फ हमें निर्मल बनाती है, बल्कि हमारे सम्पर्क में आने वालोें को भी निर्मल बनाती है। दया को मन में धारण करो, तो मुनि बन जाआगे, कर्मो की निर्जरा हो जाएगी। थोडी भी दया की तो वह व्यर्थ नहीं जाएगी। यह ऐसा धन है कि जो ब्याज सहित आपको फल देगी। दया के साथ स्वार्थरूपी कर्ज मत लेना, वरना मूल भी जाएगा और ब्याज भी जाएगा। किसी जीव पर दया करते हो तो यह मत देखो कि वह जीव कौन है, दया तो सभी पर करनी चाहिए, दया तो प्राणी मात्र पर करनी चाहिए। दयावान व्यक्ति का प्रभाव ही इतना होता है कि वह पूरे वातावरण को निर्मल बना देता है। दया भाव रखोगे तो क्रूर से क्रूर प्राणी भी आपके सामने नतमस्तक हो जाएगा।

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