भाग सोलह : दूसरों की अंतर्वेदना दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे सातगौड़ा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

सातगौड़ा की बातें सभी लोग मानते थे और हर रोज उनकी दुकान पर 15-20 लोग शास्त्र चर्चा करने आते ही थे। ऐसे ही एक व्यक्ति उनके पास रोज शास्त्र चर्चा के लिए आता था। उसका नाम मलगौड़ा पाटील था। एक रात वह शास्त्र चर्चा के लिए नहीं आया। सातगौड़ा ने सोचा कि जो व्यक्ति रोज मेरे पास आता है, आज वह क्यों नहीं आया, जरा घर जाकर पूछ कर आऊं। सातगौड़ा शास्त्र चर्चा के बाद उसके घर चले गए लेकिन मलगौड़ा अपने घर पर भी नहीं था। सातगौड़ा उसे ढूंढते हुए उसके खेत तक जा पहुंचे। वहां जाकर देखा कि मलगौड़ा स्वयं को फांसी लगाने की तैयारी कर रहा है। यदि कुछ समय और देर हो जाती तो वह मर जाता लेकिन उस समय तक उसकी सांस चल रही थी। सातगौड़ा ने उसे तुरंत फंदे से उतारा और अपनी दुकान में लाकर खूब समझाया। सातगौड़ा ने मलगौड़ा की अंतर्वेदना दूर की। इससे उसके मन से आत्महत्या का विचार चला गया। इस तरह से सातगौड़ा ने मलगौड़ा के प्राणों की रक्षा की। सातगौड़ा दुकान में काष्ठासन पर ही सोते थे। सुबह उठते ही सामायिक करते थे।

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