घोड़ों का सईस

label_importantकथा सागर

एक बार घोड़ों के मालिक की कन्या से घोड़ों के सईस को प्रेम हो गया।
जब वेतन का समय आया तो कन्या ने सईस से कहा कि तुम वेतन के बदले घोड़ा मांगना। इससे पहले तुम पत्थरों का एक कुंडा भरकर किसी वृक्ष से नीचे गिराना। जो घोड़ा आवाज सुनकर भी भयभीत न हो, उसे ले लेना। इसके अलावा ढोल सुनकर या आराम से सोते हुए कर्कश शब्द करने पर भी न जागने वाले घोड़े तुम लेना।
सईस ने ऐसा ही किया और दो घोड़े चुन लिए। इस पर मालिक ने कहा कि वह इन दोनों घोड़ों को छोडक़र और कई भी घोड़ा ले ले लेकिन सईस नहीं माना। मालिक ने अपनी कन्या का विवाह सईस के करना चाहा लेकिन उसकी पत्नी नहीं मानी। इस पर मालिक ने उसे एक कथा सुनाई।
‘एक बढ़ई अपनी शादी के बाद घर पर कोई काम नहीं करता था। उसकी पत्नी रोज कहती लेकिन वह जगंल जाकर खाली हाथ लौट आता। छह महीने बाद उसने भोजन परोसने वाली कलछी तैयार की। बढ़ई ने अपनी पत्नी से कहा कि इस कलछी का दाम एक हजार रुपए है और इससे परोसी जाने वाली कोई चीज कभी खत्म नहीं होती। एक सेठ ने वह कलछी खरीद ली और उसमें सोना भर दिया। अब वह कलछी हमेशा सोना उगलने लगी। सेठ ने आदर-सत्कार से उस बढ़ई को विदा किया।’ यह सुनकर मालिक की पत्नी सईस से अपनी कन्या का विवाह करने को तैयार हो गई। सईस घर जमाई बनकर रहने लगा।

इस कहानी का नैतिक मूल्य है कि गुणी व्यक्ति बहुत मुश्किल से मिलते हैं। अगर ऐसा गुणी व्यक्ति आस-पास हो तो उसे कभी दूर नहीं जाने देना चाहिए। वह व्यक्ति अपने गुणों से आपके जीवन में उन्नति जरूर लाता है।

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