प्रेरणा : हमारी संस्कृति है कि कन्या अकेली ना निकले – अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर जी

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पहले समय में पिता की आज्ञा से भी पुत्री को कहीं जाना होता था तो भी वह अकेली नहीं जाती थी। यही भारतीय जैन संस्कृति और संस्कार है। इसका मतलब यह नहीं था कि पुत्रियां कमजोर थीं या पिता को पुत्री पर विश्वास नहीं था, बल्कि यह हमारी संस्कृति थी कि कन्या कहीं अकेले नहीं जाए। वह हमारा अभिमान है। हमारी संस्कृति को हमारी कमजोर ना समझें। इस संदर्भ में पद्मपुराण के पर्व 65 में एक प्रसंग आया है जो स्त्रियों के लिए प्रेरणा देने वाला है।

जब रावण ने लक्ष्मण को युद्ध में विद्या से बांध दिया और जिसके प्रभाव से लक्ष्मण मूर्छा को प्राप्त हुआ तब यह पता चला कि विशल्या के स्नान के जल से इस विद्या का प्रभाव समाप्त होगा। यह पता चलते ही राम की आज्ञा लेकर हनुमान, भामण्डल तथा अंगद अयोध्या गए। वहां भरत से मिलकर यह सारी सूचना दी और कहा कि विशल्या के स्नान का जल लेने आए हैं। उसी से लक्ष्मण की मूर्छा ठीक होगी। तब भरत ने कहा जल ही क्यों तुम विशल्या को ही ले जाओ। भरत ने विशल्या के पिता द्रोणमेघ को समाचार भेजा। द्रोणमेघ ने अपनी पुत्री को भरत की माता केकयी के साथ भरत के पास भेज दिया। भामण्डल ने विशल्या को अपने विमान में बैठाया, पर वह उस समय भी अकेली नहीं थी। एक हजार से भी अधिक कन्याएं उसके साथ थी।

सोचिए इतनी शक्ति सम्पन्न कि जिसके स्नान के जल और स्पर्श आदि से रोग दूर हो जाएं वह भी अकेली नहीं गई। यह कोई स्त्री के कमजोरी नहीं बल्कि उसका अभिमान है। यही तो भारतीय संस्कृति और संस्कार हैं। वर्तमान में इस अभिमान को कमजोरी का नाम दिया जा रहा है जिसका दुष्परिणाम दिख भी रहा है और स्त्री की लाज-लज्जा लुप्त से होती जा रही है।

अनंत सागर
प्रेरणा
छयालीसवां भाग
18 मार्च 2021, गुरुवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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