कर्म सिद्धांत : कर्मों के खेल निराले – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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महलों में सोने वाला वन-वन भटकता है। संगीत की आवाज सुनकर उठने वाले की नींद क्रूर जानवरों की आवाज सुनकर खुलती है। इससब को क्या कहेंगे? कर्मो का खेल ही तो कहेंगे। पद्मपुराण में एक प्रसंग आया है अनंगशरा का….

आओ उसे पढ़ते हैं-

त्रिभुवनानन्द नाम का राजा था। उसकी अनंगशरा नाम की पुत्री थी। उसी राज्य में एक नगर था उड़नगर, जिसका राजा पुनर्वसु था। वह मोहित होकर अनंगशरा को हरणकर ले गया। यह बात जब अनंगशरा के पिता को पता चली तो उसके सैनिक पुनर्वसु के पीछे निकले। राजा के सैनिकों से युद्ध करते हुए पुनर्वसु ने अनंगशरा को विमान से छोड़ दिया। अनंगशरा भयानक वन में जा गिरी। वह वन इतना भयंकर था कि वहां मात्र क्रूर जानवर ही रहते थे। अनंगशरा उस वन में अपने कर्मो को याद करती हुई कहती रहती थी कि कहाँ मैं राजमहल में अनेक साधनों से जीवन व्यतीत करती थी और आज कहाँ ऐसे वन में आ गई हूं जहां क्रूर जानवरों का डर है। पिता को याद कर कहती थी तुम कहाँ चले गए? तुम तो मेरा एक भी आंसू नही देख पाते थे और आज इतने कष्ट में हूं फिर भी तुम साथ नहीं हो और ना मुझे इस जंगल से निकाल पा रहे हो।

इस प्रकार अपने बीते दिनों को याद करती हुई वह वन में रहने लगी और फल आदि खाकर जीवन व्यतीत करने लगी। कभी-कभी उपवास आदि करती रहती थी। पारणा तो उसने पानी से ही किया। इस प्रकार तीन हजार वर्ष तक वह बाह्य तप करती रही। जब उसका शरीर शिथिल हो गया तब उसने चारों प्रकार का आहार त्यागकर समाधिमरण नियम धारणकर लिया। उसने यह भी नियम लिया कि अब मैं जहां बैठी हूं उससे सौ-सौ हाथ से बाहर नहीं जाऊंगी।

इसी बीच वहां पर तीर्थयात्रा कर लब्धिदास नाम का एक सेठ आया। उसने अनंगशरा को कहा चलो मैं तुम्हें पिता के घर ले चलता हूं। उसने मनाकर दिया कि मेरा नियम है कि सौ हाथ से आगे नही जाऊंगी। लब्धिदास ने राजा त्रिभुवनानन्द के पास जाकर पूरी बात बताई। यह सुनते ही वह जंगल में आया और क्या देखता है कि अनंगशरा को एक अजगर खा रहा है। राजा अजगर को मारने लगा तो अनंगशरा ने दया भाव रखते हुए उस अजगर को मारने नहीं दिया। यह देखकर राजा त्रिभुवनानन्द को वैराग्य हो गया और उन्होंने बाईस हजार पुत्रों के साथ दीक्षाधारण कर ली। अनंगशरा को अजगर ने खाया तो वह मरकर ईशान स्वर्ग में देव हुई और वहां से मरणकर विशल्या हुई। यह वही विशल्या है जिसके स्नान के जल से लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर हुए थी।

तो देखा कर्म का खेल कैसे-कैसे सुख और दु:ख एक ही भव में देखे और दया का भावकर ईशान स्वर्ग गई तथा विशल्या बनी।

अनंत सागर
कर्म सिद्धांत
छयालीसवां भाग
16 मार्च 2021, मंगलवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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